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संपादकीय


आधार कार्ड के फांस में कहीं खुद न फंस जाए सरकार

झारखंड में भूख से मौतों के बाद देश में आधार कार्ड की अनिवार्यता को लेकर बहस एक बार फिर गरमा गई है


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भारत में विकास की दिशा और उससे जुड़े दावों को लेकर विरोधाभास लगातार बढ़ता जा रहा है। एक एेसे समय में जब झारखंड में भूख से एक के बाद एक तीन मौतें देश और समाज की तरक्की की सच्चाई जाहिर कर रही हैं, सरकार अपने हाथों में वर्ल्ड बैंक के उस सर्टिफिकेट को लेकर घूम रही है, जिसमें पहली बार भारत व्यापार की आसानी वाले सौ देशों की सूची में शामिल हुआ है। एक बात और यह कि देश में भूख से लड़ने के लिए जो सरकारी योजनाएं हैं, उसमें आधार कार्ड की घोषित-अघोषित दरकार शामिल हो गई है। झारखंड में भी जो मौतें हुईं, उसके पीछे आधार योजना की विफलता रही है।

दिलचस्प है कि एक तरफ केंद्र सरकार आधार कार्ड को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए अनिवार्य बनाने पर तुली है, तो वहीं दूसरी तरफ तमाम याचिकाकर्ता इसे निजता में दखलंदाजी मानते हुए इसके विरोध पर अड़े हुए हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुआई वाले खंडपीठ ने इस पर विस्तृत सुनवाई करने का फैसला किया है। इसी हफ्ते याचिकाओं की सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने कहा कि वह इस बारे में संविधान पीठ का गठन करने जा रहा है, जो नवंबर के अंतिम सप्ताह में विस्तृत सुनवाई करेगा। दिलचस्प है कि इससे पहले नौ सदस्यीय संविधान पीठ निजता को मौलिक अधिकार घोषित कर चुकी है। आधार योजना की सबसे बड़ी विफलता में जहां एक तरफ इससे गोपनीयता भंग होने की शिकायत है, वहीं ग्रामीण इलाकों में गरीबों के आधार कार्ड बनने को लेकर अब भी कई गंभीर शिकायतें हैं।

बावजूद इसके सरकार आधार को सीधे योजना लाभ से जोड़ रही है। 25 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए आधार की अनिवार्यता की समय-सीमा 31 मार्च, 2018 तक बढ़ा दी गई है। लेकिन असल मुद्दा यह है कि सरकार आधार पर इतना जोर क्यों दे रही है? इस बीच झारखंड में हुई मौतों ने तो इस सवाल को और गंभीर बना दिया है। सरकार भी कहीं न कहीं यह समझ रही है कि अगर आधार योजना फेल होती है तो यह एक योजना भर की नाकामी नहीं होगी बल्कि सरकार की समझ और दृष्टि पर भी इससे एक बड़ा सवालिया निशान लग जाएगा।
 

 

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