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मनोरंजन


11 अक्टूबर को याद आएंगे लोकनायक या महज महानायक

21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कुछ शुभ संकेत प्रकट हुए। सड़कों पर तिरंगा लेकर देश के नवनिर्माण के लिए उतरने वाले नौजवानों की ललक में भले बहुत गंभीरता न हो


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नई दिल्लीः भारत के लिए चुनौती आज क्या है? इस सवाल का जवाब ही यह साफ करेगा कि हम देश और समाज को लेकर किस तरह की चेतना से भरे हैं। वह चेतना जो पूरी तरह बाजार प्रायोजित है या फिर ऐसी चेतना जो विचार और समाज को एक सीध में देखने की चुनौती सामने रखती है। इस सवाल और चिंता को लेकर हमारी समझ की स्थिति क्या है, इसके लिए एक दिन की चर्चा काफी है। ग्यारह अक्टूबर वैसे तो कैलेंडर के बाकी दिनों की तरह एक आम दिन है। पर इस दिन को मीडिया और उसमें भी खासतौर पर टीवी चैनलों ने इसलिए खास बना दिया क्योंकि इस दिन अभिनेता अमिताभ बच्चन का जन्मदिन है, लेकिन एक कथित महानायक को याद करते हुए हमारे दौर के लिए दो जरूरी नाम अक्सर या तो छूट जाते हैं या फिर कम ही याद आते हैं। ये दो नाम हैं जयप्रकाश नारायण यानी जेपी और नानाजी देशमुख। ग्यारह अक्टूबर को इनकी भी जयंती है। जेपी को जनता ने ही कभी लोकनायक कहा था तो नानाजी आधुनिक राजनीति में संत छवि को जीने और निभाने वाले रहे।

21वीं सदी के दूसरे दशक के आगाज के साथ भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने वाले कुछ शुभ संकेत प्रकट हुए। सड़कों पर तिरंगा लेकर देश के नवनिर्माण के लिए उतरने वाले नौजवानों की ललक में भले बहुत गंभीरता न हो पर इस ललक की प्रासंगिकता और ईमानदारी पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है। इस ललक के आलोक में ही देश में 1974 के बाद फिर से यह स्थिति आई कि हम देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसकी बुनियादी अवधारणा के साथ बहसीय मुठभेड़ कर सकें। इस मुठभेड़ ने ही यह साफ किया कि जो व्यवस्था राजनीतिक पथभ्रष्टता और भ्रष्टाचार की महामारी फैलाने की मशीनरी बन गई है, उसके कायम रहते राष्ट्रीय विकास और नवनिर्माण जैसे किसी लक्ष्य तक पहुंचने का संकल्प कैसे पूरा हो सकता है। जिस नई पीढ़ी की वैचारिक-सामाजिक संलग्नता को लेकर हम तरह-तरह के आग्रह-पूर्वाग्रह पाले बैठे हैं, उस फेसबुकिया पीढ़ी ने आगे आकर यह साफ किया कि सेक्स, सक्सेस और सेंसेक्स से आगे उसकी उड़ान देश और समाज के रचनात्मक उन्नयन से भी जुड़ी है। देश की युवाशक्ति की यह नई शिनाख्त राष्ट्रनिर्माण में उनकी प्रासंगिक भूमिका की नई पटकथा की तरह है, जिसमें अभी कई घटनाक्रम जुड़ने बाकी हैं।

कुछ अरसे पहले टीवी पर एक विज्ञापन खूब चला, जिसमें नेता और राजनीति में बदलाव के लिए माहौल को बदलने की बात जोर-शोर से की जाती है। विज्ञापन का संदेश था कि पुराने माहौल और पुरानी राहों ने अगर हमें निराश किया है तो निश्चित रूप से नए परिवेश और नए पथ की बात होनी चाहिए। यहां तक तो विज्ञापन की सैद्धांतिक टेक समझ में आती है पर क्षोभ तब होता है जब पता चलता है यह सब दिखाया-समझाया इसलिए जा रहा है क्योंकि एक महंगा प्लाई कवर बेचना है। जिस दौर में डेमोक्रेसी भी एड मैनेजमेंट का एक जरूरी सब्जेक्ट है, उस दौर के लिए इतनी बात तो जरूर कही जा सकती है लोकतंत्र की बेहतरी के लिए एक जरूरी रचनात्मक हस्तक्षेप की भूमिका बन चुकी है। अब तो बस इसके आगे के अध्याय लिखे जाने हैं। जेपी बिहार आंदोलन के दिनों में अकसर कहा करते थे कि जनता को 'कैप्चर ऑफ पावर’ के लिए नहीं बल्कि 'कंट्रोल ऑफ पावर’ के लिए संघर्ष करना चाहिए। अच्छी बात यह है कि राजनीति की जगह लोकनीति और सत्ता के विकेंद्रीकरण की बात अब फिर से होने लगी है। असंतोष सिर्फ इस बात को लेकर है कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के इन जरूरी मुद्दों को गिनाने वाले मुंह और खुले मंच तो आज कई हैं पर आमतौर पर इनका सरलीकृत भाष्य ही परोसा जा रहा है।

यह सरलीकरण खतरनाक इसलिए है क्योंकि इसमें एक्टिविज्म और मार्केट फोर्सेज की सरपरस्ती के लिए एक साथ स्वीकार है। यह मलेरिया के मच्छर और उसके टीके को एक साथ लेकर चलने की स्थिति है। यह एक छल है। यह छल ही है जो एक तरफ तो अमिताभ बच्चन और सचिन तेंदुलकर जैसों के स्टारडम को पाए की तरह खड़ा करता है, वहीं लोकनायक जैसी शख्सियत को भूलने की चालाक दरकार को भी अमल में लाता है। बदलाव न तो बिकाऊ हो सकता है और न चलताऊ। इसे एक चैरिटी की तरह भी आप नहीं चला सकते। विचार एक कसौटी है, जो विचार, उसकी दरकार और आचरण को एक कलेक्टिव एक्शन की शक्ल देता है। आज अगर कुछ मीसिग है तो यही कलेक्टिव एक्शन।

जेपी की लोकनीति और उसके लिए बनी लोक समिति ने कारगर तौर पर अपना प्रभाव भले न दिखाया हो पर उसका सबक तो आज भी प्रासंगिक है। और यह सबक यही है कि ग्रामसभा से लेकर लोकसभा तक का पिरामिड अगर उलटा खड़ा है तो देश में लोकतंत्र की क्या स्थिति है यह अपने आप में विचारणीय है। लोकतंत्र की आत्मा न तो तंत्र में है और न ही इसके किसी शीर्ष में। यह आत्मा तो स्वाभाविक रूप से लोक में बसती है। यही नहीं, केंद्रीकरण के उलट विकेंद्रीकरण लोकतंत्र का स्वाभाविक चरित्र है। अपने इस चरित्र के साथ ही लोकतंत्र सर्वाधिक रूप से कारगर है। आज अगर प्रातिनिधिक लोकतंत्र के नाम पर सत्ता की ताकतें दिल्ली, लखनऊ, पटना जैसी राजधानियों में कैद हैं तो यह लोकतंत्र के लिए एक विलोमी स्थिति है। ग्राम पंचायतों का सशक्तिकरण देश में लोकतंत्र के प्रातिनिधिक ढांचे को सहभागिता के ढांचे में तब्दील कर सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि लोकसभा या विधानसभा की तरह ग्रामसभा कभी विघटित नहीं होती है। इसका अस्तित्व हमेशा कायम रहता है और संबंधित क्षेत्र के अठारह साल के सभी नागरिक इसके आजीवन सदस्य हैं।

नीति और विधि की दरकारों को अगर सरकारें इस विकेंद्रित लोकतांत्रिक इकाई के साथ तय करें तो इसमें पूरे देश की प्रत्यक्ष लोकतांत्रिक भागीदारी तो होगी ही, यह नीतियों और कानूनों को लागू कराने का बड़ा आधारतल भी बनेगा। जेपी ने बिहार आंदोलन के दौरान ये बातें चीख-चीखकर कहीं। पर न तो इस आंदोलन से निकलीं सियासी जमातें इस बात को जनता के बीच एक मुद्दे की शक्ल देने का साहस दिखा पा रही हैं और न ही जेपी का नाम लेने वाली एक्टिविस्टों की फौज इस दिशा में कोई ठोस और बड़ी पहल कर पा रही हैं। ऐसा इसलिए भी है कि हम आइकनों को गढ़ने और उन्हें मान्यता देने में फौरी बाजारवादी ताकतों की गिरफ्त में होते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि एक देश के जीवन में परंपरा और इतिहास के भी कुछ जरूरी सबक शामिल होने चाहिए। जेपी ऐसे ही एक सबक का नाम है, जिसको भूलने का मतलब लोकतांत्रिक सुधार की प्रक्रिया को स्थगित करना है। इस स्थगन को तब और खतरनाक मानना चाहिए जब वह बाजार के एक महानायक के महिमामंडन के नाम पर हो। 21वीं सदी का बारत इस खतरे को पहचानने में ज्यादा देर नहीं करेगा, ऐसी कामना करनी चाहिए।

 

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