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साहित्य/संस्कृति


क्या होता है ये प्रेम? 

रत्यात्मक प्रेम की इंतहा कैनिबलिज्म है। एक दूजे को रिझाने के लिए कितने पैंतरे बदलते हैं प्रेमी-प्रेमिका, शमा-परवाना! कौन शमा है, कौन परवाना? दोनों ही परवाना हैं, शमा है प्रेम की वह 'ज्वाला, 'लौ या 'आग? यह दो पतंगों का आकाश में एक दूजे की ओर आना या चक्कर काटने जैसा होता है, नाच रहे हैं, परस्पर एक दूजे को रिझा रहे हैं, लिपटे कि एक को कट जाना है


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प्रेम में तमाम लोग, तमाम जिंदगी, तमाम तरह की बेवकूफियां करते रहते हैं, फिर भी प्रेम क्या है, कोई सटीक नहीं बता पाता। सहज बोध से सहज रूप में हम कह सकते हैं कि किसी को चाहना ही प्रेम है।

'नैनन की चिक डारि के पिय को दिया रिझाव। आंखें प्रेम का प्रस्थान बिंदु। वरिष्ठ लेखिका मेहरून्निसा परवेज की सुनें तो 'प्रेम एक बिच्छू है, जो आंख से चढ़ता है और जांघ से उतरता है, लेकिन गुलजार कुछ और ही कहते हैं- 'हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू / हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलजाम न दो / सिर्फ अहसास है यह रूह से महसूस करो / प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।

यानी गुलजार जिसे निहायत ही पवित्र और फूल की खुशबू की तरह फूल से परे मानते हुए छू देने भर से म्लान हो जाने से डरते हैं-
'भूमि परत भा ढाबर पानी,
जिमि जीवहिं माया लपटानी,

वह प्रेम देह से गुजरे बिना परवान नहीं चढ़ता- यह मेहरून्निसा परवेज जी का मानना है। मेहरून्निसा अकेली नहीं हैं, आइए देखें, निदा फाजली साहब क्या कहते हैं-
'मैं तुमसे गुजर कर ही / तुम तक पहुंचने की रफ्तार हूं / मेरे आगाज तुम, मेरे अंजाम तुम / तुम्हें देखकर मैं तुम्हें सोचता हूं / तुम्हें पा के ही मैं तुम्हें खोजता हूं / तुम अपने बदन के समन्दर में / सदियों का पोशीदा इक ख्वाब हो / और मैं खून की तेज गर्दिश में बनती हुई / आंख हूं और फैज साहब...? 'तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...

आंखों की अहमियत इतनी कि इसी पंक्ति को बाद में उनकी अनुमति से मजरूह सुल्तानपुरी ने 'चिराग’ फिल्म में लिया। तो क्या वे जिनकी आंखें नहीं हैं, प्रेम नहीं करते। घृतराष्ट्र तो अंधे थे और गांधारी ने भी आंखों पर पट्टी बांध रखी थी। सौ संतानें बिना प्रेम के हो गईं? यानी आंखें नहीं, मन की आंखें चाहिए। एक तरल उन्माद भरी खुशबू, जो अपने प्रेमी में पिघल कर एकाकार हो जाना चाहती है- प्यार ऐसी ही कोई चीज होती होगी। सात्र के अनुसार पति-पत्नी दो नहीं, एक इकाई होते हैं। एक का अस्तित्व दूसरे में विसर्जित हो जाता है 'प्रेम गली अति सांकरी, ता में दोउ न समाहि।

एक कंप्यूटर वैज्ञानिक से किसी ने पूछा, 'प्रेम क्या है और देह क्या है? उन्होंने थोड़ी देर सोचा, फिर कहा, 'अगर देह को हार्ड डिस्क मानें तो प्रेम उसका सॉफ्टवेयर है, लेकिन बिना हाई डिस्क के सॉफ्टवेयर की कल्पना भी नहीं कर सकते।  यानी बिना देह के प्रेम कहां? रत्यात्मक प्रेम में दो स्थितियां होती हैं- अरेंज्ड मैरिज या लव मैरिज। पहली स्थिति में प्रेम बाद में संभावित है, जबकि दूसरी स्थिति में शुरूआत ही प्रेम से होती है। इसके अलावा प्रेम की दो स्थितियां और हैं- एक पक्षीय और उभय पक्षीय। एक स्त्री या पुरुष सिर्फ एक से प्रेम करता है- यह एकनिष्ठता सरासर झूठ है, एक व्यक्ति एक साथ कई-कई व्यक्तियों से, जिनमें विपरीत लिंगी भी शामिल हैं, एक ही साथ प्रेम कर सकता है। इन सब में देह ही आधार है। 'प्लेटोनिक लव’ या अशरीरी प्रेम का आधार भी देह ही है, शरीर उपस्थित न भी हो तो उसका अहसास बना रहता है। अहसास का आधार स्वार्थ है और स्वार्थ का आधार भूख। हमारा सारा जीवन स्वार्थ से संचालित होता है- 'स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति / सुर नर मुनि सबकी यह रीति।

हमारी संस्कृति में भोग से ज्यादा त्याग को गरिमामंडित किया गया है, पर त्याग किसके लिए, दूसरों के भोग के लिए? रत्यात्मक प्रेम की सारी केमिस्ट्री सृजन के निमित घूमती है। पुरुष के लिए एक आकर्षक स्त्री और स्त्री के लिए एक आकर्षक पुरुष (आकर्षक की वजह सबकी भिन्न-भिन्न भले हो), इसीलिए स्त्री हो या पुरुष अपने-अपने प्रेम के शृंगार करते हैं, सजते हैं-'सजना है मुझे सजना (सजनी) के लिए’ बाजारवाद की भाषा में क्रिकेट, फिल्म, कॉल गर्ल्स, पुरुष वेश्या या अन्य बिकाऊ चीजों की तरह जब उन्हें अहसास हो जाता है कि मेरा सबसे अच्छा (लाभप्रद) खरीददार मिल गया तो वह बिक जाता है। गरज कि देह से परे कुछ भी नहीं, जो देहातीत है, वह भी देह आधारित है।

'कितने लाखों वर्षों की समस्त संस्कृति की चरम उपलब्धियों के रस से तुम्हारा यह जिस्म बना है। इसके एक-एक अंग को आत्मसात कर मैं जो दृष्टि पाता हूं, वह सर्थकर्तृत्व की दृष्टि है, (डा. धर्मवीर भारती का पत्र पुष्पा भारती के नाम) वैज्ञानिकों की सुनें तो यह सब कुछ नहीं, सिर्फ हारमोन्स का खेल है। उस हारमोन का नाम है पी.ई.ए. फिनाइल इथाइल एलेनाइन। वैज्ञानिक कहते हैं कि करोड़ों वर्ष पहले एक ही कोशिका में समाए हुए थे डिम्ब और शुक्राणु। फिर वे अलग हुए, वैसे ही, जैसे सूरज से पृथ्वी अलग हुई। बड़ा वाला अंश डिम्ब बना, छोटे-छोटे अंश शुक्राणु। पुरानी स्मृतियां उन्हें मिलन की ओर खींचती हैं। प्राय: दो अरब वर्ष पहले काम क्रिया का विकास होता है बड़े से डिम्ब के लाखों शुक्राणुओं द्वारा अभिसंचित करने का संघर्ष! जैसे दो प्यासी आत्माएं परस्पर मिलने को उतावली हों। ये दो, दो नहीं एक हैं। हर संयोग के साथ बदलते रहे जीन्स। संशोधित होती रही यह प्रक्रिया और धरती स्पेसिस से भरती गई। प्रकृति जीवों के बिना अमूर्त है। वह जागती है जीवों द्वारा और जीव जागते हैं चेतना से। इस चेतना का स्रोत क्या है-काम! काम कार्य है या कारण? कारण! तो फिर कार्य क्या है? सृष्टि! काम ही बांधता है जीवों को। यह किसी महायोगी शिव का तप भंग करने के चलते भस्मसात कर दिया जाता है, लेकिन फिर उसी शिव का वरदान पाकर उन्हीं की मिथुनमुद्रा के बहाने उनका विद्रूप बनकर खुद की पूजा करवाता है- बोलो महायोगी, अब बोलो।

प्रेम की प्रतीति
क्रोमोजोम्स की सीढिय़ां चढ़ते-उतरते वैज्ञानिकों ने ऑक्सीटोमिन हारमोन के कुछ प्रयोग किए थे। चूहे कुछ ज्यादा ही कामात्र्त होते हैं। चुहिया को सूंघकर चूहा पता लगा लेता है कि वह उसकी सेक्स पार्टनर बनेगी या नहीं। वैज्ञानिकों ने देखा कि हर मिलन के बाद चूहा-चुहिया से तटस्थ हो जाता है। इसे इंसानों पर आरोपित करें तो दुष्यंत-शकुंतला का उदाहरण सामने आता है। ऑक्सीटोमिन इंजेक्ट किया गया। चूहा फिर से चुहिया के प्रति आसक्ति महसूस करने लगा। आक्सीटोमिन के प्रभाव से सामाजिक जुड़ाव की स्मृतियां लौट आती हैं।
शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि मंडन मिश्र को तो उन्होंने शास्त्रार्थ में परास्त कर दिया, मगर उनकी पत्नी से वे हार गए। क्यों परास्त हो गए? सवाल सेक्स से जुड़ा था कि स्त्री में काम सर्वप्रथम कहां परिलक्षित होता है। कहा जाता है कि आचार्य को इसके लिए किसी गणिका के यहां कुछ दिन रहना पड़ा और तभी वे इस प्रश्न का सही उत्तर दे सके।
रत्यात्मक प्रेम की इंतहा कैनिबलिज्म है। एक दूजे को रिझाने के लिए कितने पैंतरे बदलते हैं प्रेमी-प्रेमिका, शमा-परवाना! कौन शमा है कौन परवाना? दोनों ही परवाना हैं, शमा है प्रेम की वह 'ज्वाला, 'लौ या 'आग’? यह दो पतंगों का आकाश में एक दूजे की ओर आना या चक्कर काटने जैसा होता है, नाच रहे हैं, परस्पर एक दूजे को रिझा रहे हैं, लिपटे कि एक को कट जाना है।

रत्यात्मकता को हम प्रेम की झोली में डाल कर मुक्त नहीं हो सकते। इसका एक सिरा सेक्स कैनिलिज्म की ओर जाता है तो दूसरा सिरा सेक्स से परे हिंसा, अपमान (मान मर्दन) की ओर भी जाता है। बलात्कार में प्रेम ही नहीं, प्रेमेतर हिंसा भी शामिल होती है। यह संयोग से समाधि तक ले जाकर 'चिर समाधि’ तक ले जाता है। रत्यात्मक प्रेम को ही सब कुछ मान लेना प्रेम की उदात्तता को सीमित करना है। 

'छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए / ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए / प्यार से भी जरूरी कई काम हैं / प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए।

कुल निहितार्थ क्या हुआ? प्यार सब के लिए, लेकिन इसका आशय यह कतई नहीं कि प्रेम देहोत्तर हो गया। तनिक व्यापक परिपेक्ष्य में प्रेम को समझने के लिए हम फिर विज्ञान के पास चलते हैं। इस संदर्भ में यहां दो नियमों का हवाला लेते हैं- प्रथम-न्यूटन का वैश्विक गुरूत्वाकर्षण का नियम बताता है कि दुनिया की हर शै, दुनिया की हर दूसरी शै को अपनी ओर आकर्षित करती है या खींचती है और यह आकर्षण दोनों ही संहतियों के गुणनफल के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यानी प्रकृतत: हम सबसे प्रेम करने के लिए बने हैं, घृणा करने के लिए नहीं। बाकी दो घटक उसे प्रभावित करते हैं, यह और बात है।

द्वितीय- थर्मोडायनामिक्स के तीसरे निमय के अनुसार दुनिया की हर शै बर-बुता जाने की ओर या विसर्जित हो जाने को अग्रसर है-
'जब पल भर का है मिलना / फिर चिर वियोग में झिलना / एक ही प्राप्त है खिलना / फिर सूख धूल में मिलना / फिर क्यों चटकीला सुमन-रंग / जलता है यह जीवन पतंग।

महाभारत के शांति पर्व में भी भीष्म के द्वारा कुछ इसी तरह कहलाया गया है...जो असत् है, वह भी नष्ट होगा, जो सत् है, वह भी, कुछ भी नहीं बचेगा। यह हमारे प्रेम करने की अनिवार्यता, हमारे नाशवान होने की मजबूरी दोनों को व्यक्त करता है। प्यार कर ले, नहीं तो यूं ही मर जाएगा। 
जिस्म के बिना प्रेम कहां, जिस्म के बाहर प्रेम कहां। ये महकते कामी केश-गुच्छ, गाल, त्वचा, आंखें, चिबुक, ग्रीवा, उरोज... और क्या नहीं। ललिता द्वारा दिखाया गया उद्भुत अनुपम बाग क्या दर्शाता है।

'अद्भुत एक अनूपम बाग। / जुगल कमल पर गजवर क्रीड़ता / तापर सिंह करत अनुराग।

यह पूरी देह एक अद्भुत अनूपम बगीचा है। दोनों पैर कमल के फूल... कमल के फूलों पर गजरात झूमता है(गजगामिनी), पांवों के ऊपर सिंह(सिंह जैसी पतली कमर, सिंह पर सरोवर (पेट), सरोवर पर पहाड़ पसली, पहाड़ पर दो-दो पराग युक्त कमल (स्तन) फिर एक-एक कर दूसरे मादक अंग...देह का यह अद्भुत बगीचा राधा जी का है जो कृष्ण को देहासक्त बनाता है। सूर हों या तुलसी, विद्यापति हों या जयदेव, कबीर हों या कालीदास, सर्वत्र देह ही देह है। राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, राम-सीता की भक्ति की ओट लेकर अपनी यौन वुभुक्षा को भी शांत करते मिले हैं भक्त लोग।

सिर्फ और सिर्फ प्रेम ही मानवीय अस्तित्व की समस्याओं का एक मात्र रचनात्मक, तृप्तिदायी और संतोषप्रद समाधान है। यह और बात है कि अधिसंख्य लोग प्रेम की अपनी क्षमता को उस स्तर तक विकसित नहीं पाते, जो इस समाधान के लिए जरूरी है-एक ऐसा प्रेम, जो परिपक्कवता, आत्मज्ञान और साहस का परिणाम होता है, जो उसकी शख्सियत को मुक्कमिल कर दे।

बाजारू फिल्मों(प्यार कर ले नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा) ने प्यार के व्यापक अर्थ को रत्यात्म प्रेम तक सीमित और संकुचित कर दिया है, जबकि अर्थपूर्ण फिल्मों और साहित्य ने उसे व्याप्ति दी है। 'काबुलीवाला (कहानी और फिल्म) में काबुलीवाला जिस नन्हीं बच्ची से जुड़ाव महसूस करता है, वह भी तो प्रेम है। माता-पिता अपनी संतानों, लोग अपने रिश्तेदारों-मित्रों से जुड़ाव महसूस करते हैं। जेंडर कोई हो, उम्र कोई हो, जीव कोई हो, यहां तक कि किसी स्थान विशेष, वस्तु विशेष और दृश्य विशेष, कला विशेष तक से भी हम जो जुड़ाव महसूस करते हैं, वह भी तो प्रेम है। सभी अपने-अपने ढंग से प्रेम करते हैं, सभी क्रांतिकारी प्रेमी होते हैं और सभी सच्चे प्रेमी क्रांतिकारी। अंदाज अलग हो सकता है, आगाज अलग हो सकता है, अंजाम अलग हो सकता है, पर होता है वह प्रेम ही।

एक बार फिर रत्यात्मक प्रेम पर आते हैं। फ्रायड के अनुसार हमारी समस्त क्रियाओं के पीछे सेक्स अन्तर्धारा के रूप में कार्य करता है। यानी प्रेम, घृणा, महत्वाकांक्षा, ईष्या सभी यौनात्मक संवेगों के प्रतिफल हैं। इस तरह फ्रायड ने देह की सत्ता को सर्वोपरि बताया। फ्रायडवाद भौतिकता का उद्घोष था, पर यह अर्द्धसत्य मात्र था, क्योंकि यह उपभोक्तावाद तक सीमित था। द्वितीय विश्वयुद्ध पूंजीवाद और विजय की भावना को प्रतिष्ठित करता है- सभी भोग सामग्रियों पर कब्जा करना। इन भोग सामग्रियों में 'स्त्री’ भी। फ्रायड को अकेले दोष क्यों दें, मर्यादा की बीड़ा उठाने वाले गोस्वामी तुलसीदास तक इसे अस्वीकार नहीं कर सके थे- 'सुकचंदन बनिता दिक भोगा / किए बास जहं-तहं पुर लोगा।

यानी माला, चंदन और बनिता आदि सामग्रियां मुहैया कराई गईं और अध्योध्या पुरी के लोगों ने उनके साथ जहां तहां रात काटी(संदर्भ अध्योध्या भारद्वाज ऋषि के आश्रम पर)। पूरा रामायण और महाभारत परोक्ष रूप से देह की सत्ता को सत्यापित करता है। फ्रायडवाद, जो द्वितीय युद्ध की छाया में उदित हुआ, ने एक बार फिर से इसे पुष्ट किया, लेकिन जब हम आज के बाजारवाद को देखते हैं तो फ्रायड के बरक्स एच.एस.सूलिवान के सिद्धांत उन्हें ज्यादा स्पष्टता से व्याख्यायित करते हैं। सूलिवान यौनता और प्रेम को अस्तित्व से जोड़ते हैं। उनके अनुसार दो व्यक्तियों के बीच की अंतरंगता संबंधों की ऐसी स्थिति होती है, जो वैयत्तिक लाभ के सभी पहलुओं को एक दूसरे का समान लाभ बना देता है। लुढ़कते-लुढ़कते पूंजीवाद की छाया में पले फ्रायडियन सिद्धांत पूरे विश्व में समान हितों में आ जुड़े। प्रकारांतर से यह नारी मुक्ति, दलित मुक्ति, औपनिवेशिक मुक्ति आदि मुक्तियों को बल देता है, पर यहां भी तो देह ही गेह है प्रेम का, तब भी, जब कभी-कभी प्रेम देह के अतिक्रमण का भ्रम पैदा करता है। ये स्थितियां होती हैं स्मृतियों और अनुभूतियों की।

फिल्म 'अनोखी रात’ में नायक, जो डाकू है, समर्पण सिर्फ इसीलिए करता है कि वह जिस घर में डाका डालने गया है, उसकी लड़की का चेहरा डाकू की मृत पत्नी से मिलता है। यहां भी देह है, पर पूरी तरह देह नहीं, देह की स्मृति मात्र। स्मृति और अनुभूति! यह देह से देहोत्तर होकर भी देह की डोर से बंधी है। तब फर्क यह है कि यह भोक्ता को बांधती नहीं, उसे अनुप्राणित करती है और बड़े-बड़े काम भी करवा ले जाती है। प्रेम या प्यार कभी निर्गुण निर्विकार हो ही नहीं सकता। क्या एक व्यक्ति दूसरे ऐसे व्यक्ति को उसी तरह प्यार कर सकता है, जिसके अंश विकृत हों, क्या एक पुरुष तब भी उस स्त्री को प्यार कर सकता है, जिसकी आंख, नाक, कान, गाल, स्तन, दांत, केश, जननांग आदि न हों। सुपुरुष और सुकन्या कौन नहीं चाहता?

प्रेम बड़ा है देह से या देह बड़ी है प्रेम से- इसे जानने के लिए हिंदी कथा साहित्य से साक्ष्य के लिए दो प्रेम कहानियां लेते हैं-एक बड़े फलक की कहानी, हिंदी की सबसे बड़ी प्रेम कथा-प्रभा अश्वघोष(बोल्गा से गंगा, राहुल सांकृत्यायन) दूसरी बड़े फलक की हिंदी की सबसे छोटी प्रेम कथा(भेडि़ए का एक अंश, भुवनेश्वर)
पहली कहानी में अश्वघोष कवि है,प्रभा उनकी प्रेमिका है। एक दिन प्रभा ने अश्वघोष को उदास देखा। बहुत पूछने पर अश्वघोष ने बताया, 'आज तुम मेरे सामने हो, यौवन से उद्दीप्त, सारी देह टटके फूल-सी खिली हुई। पर एक दिन यह रूप नहीं रह जाएगा। मैं उस प्रभा की कल्पना कर-कर के घबरा रहा हूं, जब यह सुंदर मुखड़ा ऐसा नहीं रह जाएगा। नहीं रहेंगे ये सुंदर गाल, ये रस भरे अधर, ये सुपुष्ट स्तन...बूढ़ी क्लीव, मुमूर्षु प्रभा। क्या कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि तुम ऐसी ही बनी रहो मेरे लिए सदा सर्वदा, गुजरते वक्त की परछाइयां, तुम्हें छू भी न पाएं। यह एक भावनात्मक निवेदन था एक कवि का। प्रभा ने सुना और मौन रह गई। 

दूसरे दिन अश्वघोष फिर उस मिलन स्थल पर आए तो वहां प्रभा न थी, था उसका पत्र-
प्रियतम, 
तुम चाहते थे न कि तुम्हारी प्रभा सदा-सर्वदा वैसी ही बनी रहे, तुम्हारे लिए, जैसी वह है। तो आज के बाद जब भी तुम प्रभा को याद करोगे, उसे वैसी ही पाओगे-चिरयौवन! तुम्हारी यह प्रभा कभी बूढ़ी नहीं होगी।

तुम्हारी 
प्रभा

प्रभा ने आत्महत्या कर ली थी।
उदात्तता की बुलंदी पर खिला प्रेम का यह अजर-अमर पुष्प है। सिर्फ अश्वघोष की भावनाओं के निमित्त प्रभा ने प्राणोत्सर्ग किया। सवाल है, देह बड़ी है प्रेम से या प्रेम बड़ा है देह से। 
दूसरी कहानी भेडि़ए में ग्वालियर से तीन नटिनिया ला रहा था बेचने के लिए अपने गड्डे पर इफ्तिरवार उर्फ खारू। गाड़ी हांक रहा था उसका बाप। बाप भेडिय़ों से बेटे को आगाह कर ही रहा था कि भेडि़ए आ गए। बाप के कहने पर बेटे ने पहले भेडिय़ों को मारने की कोशिश की, फिर सामान फेंकने लगा, ताकि गड्डा हल्का हो सके। इस क्रम में वह दोनों नटिनियों को भी भेडिय़ों के बीच फेंकचुका होता है। अब बारी है उस तीसरी नटिनी को भेडिय़ों के बीच फेंकने की। यही एक छोटी सी प्रेम कथा अंकुरित हो चुकी होती है। तीसरी नटिनी को खारू चाहने लगा था, लेकिन बाप की डांट, नटिनी को फेंकने का हुक्म है।

'तुम स्वयं कूद जाओगी, या मैं तुम्हें फेंक दूं?  खारू पूछता है। तीसरी नटिनी अपनी डबडबायी आंख से देखती है खारू को, अपने नाक की चांदी की नथ को निकाल कर वह अपने प्रेमी खारू को सौंप कर आंखें बंद कर हुकारते भेडिय़ों, यानी मौत के मुंह में कूद गई। यह सब पलक झपकते हो गया। देह से देहोत्तर होती प्रेम की यह सबसे छोटी कथा। पर आधार तो देह ही है और उत्सर्ग भी देह का ही, नाम भले प्रेम का हो, माध्यम तो देह ही है।

रोमानी प्रेम, माता-पिता-संतान, मित्रों, रिश्तेदारों के प्रति प्रेम, आत्म प्रेम-प्रेम के जो भी रूप हैं, इनमें कोई भी देह से परे नहीं। अंत में हम आध्यात्मिक प्रेम को लेते हैं-
प्रिय की सुधि सी ये सरिताएं / ये कानन कांतार सुसज्जित / मैं तो नहीं किंतु है मेरा / हृदय किसी प्रियतम से परिचित । क्या आप हृदय पर हाथ रखकर, ईश्वर और प्रिय की शपथ लेकर कह सकते हैं कि यह प्रेम देह से परे है?

रत्यात्मक प्रेम में दो स्थितियां होती हैं- अरेंज्ड मैरिज या लव मैरिज। पहली स्थिति में प्रेम बाद में संभावित है, जबकि दूसरी स्थिति में शुरूआत ही प्रेम से होती है। इसके अलावा प्रेम की दो स्थितियां और हैं-एक पक्षीय और उभय पक्षीय। एक स्त्री या पुरुष सिर्फ एक से प्रेम करता है-यह एकनिष्ठता सरासर झूठ है, एक व्यक्ति एक साथ कई-कई व्यक्तियों से, जिनमें विपरीत लिंगी भी शामिल हैं, एक ही साथ प्रेम कर सकता है। इन सब में देह ही आधार है। 'प्लैटोनिक लव  या अशरीरी प्रेम का आधार भी देह ही है, शरीर उपस्थित न भी हो तो उसका अहसास बना रहता है

 


 

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