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साहित्य/संस्कृति


यह न्यू इण्डिया है...

न्यू इण्डिया के नारे के बीच वर्तमान भारत में पानी, खेती और शहरों की तस्वीर तथा बाजार व सरकार के रवैये को सामने रखती ये चार कविताएं....


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1. पानी

बूंदा है, बरखा है,

पर तालाब रीते हैं।

माटी के होंठ तक 

कई जगह सूखे हैं।

भूजल की सीढ़ी के 

नित नये डण्डे टूटे हैं।

 

गहरे-गहरे बोर ने

कई कोष लूटे हैं।

शौचालय का शोर भी 

कई कोष लूटेगा।

 

स्वच्छ नदियों का गौरव 

बचा नहीं शेष अब,

हिमनद के आब तक

पहुंच गई आग आज,

मौसम की चुनौती

घर खेत खा रही,

स्वस्थ भारत का सपना 

जल्द-शीघ्र टूटेगा।

यह न्यू इण्डिया है.......

 

2. पानी और शासन

भाषणों में अपने वे

पानी को प्राण और 

नदियों को प्राणरेखा बताते हैं,

पर सत्ता हाथ आते ही

सबसे पहले बांध की ऊंचाई बढ़ाते हैं।

नदी मरे या जीये,

उसकी हर बूंद खींचने को

असल विकास ठहराते हैं।

हर प्यासे को नदी जोड़ की 

मृगमरीचिका दिखाते हैं।

शुद्ध पानी के नाम पर

पानी का बाज़ार सजाते हैं।

सूखा हो या बाढ़,

उन्हे सिर्फ राहत के बजट सुहाते हैं।

सिद्धि कुछ और करते है,

संकल्प कुछ और दिखलाते हैं।

 

बीमारी बनी रहे और खर्च बढ़ता रहे,

इस हुनर के वे डाॅक्टर निराले हैं। 

कारण उनकी इन्द्रियों पर लगे हुए 

कारपोरेट ताले हैं।

जनता ने भी जैसे अपने 

मुंह सी डाले हैं।

इसी कारण जो मरता था मार्च में,

अब अक्तूबर में मरता है।

यह बांदा का किसान है,

2017 का निसान है।

यह न्यू इण्डिया है...

 

3. खेती और बाज़ार

खेती है, व्यंजन हैं,

पर हुए जहरीले है।

मवेशी हैं, माटी है,

पर नसेड़ी रंगीले है।

फर्टिलाइजर खाते हैं,

कीटनाशक पीते हैं,

’जी एम’ के संग 

रंगरेली मनाते है।

मिलावट के बाज़ार 

शेष शुद्धि खा जाते हैं। 

 

लाला अब सिर्फ लाभ देखते हैं,

शुभ भूल जाते हैं।

ग्राहक को पार्टी और

दलाल को भगवान बताते हैं।

स्वदेशी को घटिया और 

परदेशी को बढ़िया बताते हैं।

हर्बल और आॅेर्गेनिक के नाम पर 

जाने-जाने क्या-क्या बेच जाते हैं।

 

क्या खायें ? क्या पीयें ?

इसीलिए उठा यह सवाल है।

जिसे शुद्ध समझा वही

निकला जी का बवाल है।

यह न्यू इण्डिया है...

 

4. शहर और ज़िन्दगी 

पहाड़ों पर पानी है,

पर लोगों से दूर है।

गांवों में जवानी है,

पर शहर जाने को बेताब है।

 

शहरों में  ख्वाब हैं, पैसे हैं, 

पर हवा खराब है।

दाना-पानी सब बने

बीमारी के असबाब हैं।

शहरों में घुटन है, गंदगी हैै,

चिकने चेहरों के पीछे भी संभव दरिंगदी है। 

गर अधूरी रह गई हसरत तो

दड़बेनुमा मकानों में पूरी ज़िन्दगी है। 

 

फास्ट लाइफ-फास्ट फूड,

भाई को ब्रो और पिता को डूड,

मशीनों से रिश्ता और रिश्तों से दूरियां,  

वे इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हैं। 

फिर भी वे हर गांव को शहर और

शहरों को स्मार्ट बनाने का सपना दिखाते हैं।

यह न्यू इण्डिया है...

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