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एक-दूसरे को कड़ी चुनौती देने को तैयार बीजेपी-कांग्रेस

गौरतलब है कि गुजरात में इस बार बिना मोदी के पहली बार चुनाव होने हैं, जिसका खासा असर बीजेपी पर पड़ सकता है। वहीं 22 सालों से सत्ता से दूर रही कांग्रेस गुजरात की सत्ता में आने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है


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नई दिल्ली: देश के दो राज्यों गुजरात व हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है और जल्द ही इन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में देश की दो बड़ी पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस ने एक दूसरे को कड़ी चुनौती देने की तैयारी कर ली है। इन विधानसभा चुनावों के जरिए जहां एक तरफ कांग्रेस अपना अस्तित्व कायम रखने की जुगत लगा रही है तो वहीं बीजेपी पीएम मोदी के सहारे पहाड़ों की सत्ता पर काबिज होना चाहती है। यदि हम बात करें हिमाचल प्रदेश की तो वहां एक बार फिर से कांग्रेस ने वीरभद्र सिंह को सीएम चेहरे के रुप में चुनावी मैदान में उतारा है तो वहीं बीजेपी ने प्रेम कुमार धूमल को इस चुनावी दंगल में अपना सीएम चेहरा बनाया है। हालांकि धूमल इससे पहले दो बार सीएम रह चुके हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने वाली बीजेपी सरकार के इस सीएम प्रत्याशी का दामन भ्रष्टाचार के मामले में धूमिल है। वहीं यदि राज्य में कांग्रेस सत्ता हासिल करने में कामयाब हो जाती है तो वीरभद्र सिंह सातवीं बार हिमाचल के सीएम बनेंगे।

गौरतलब है कि गुजरात में इस बार बिना मोदी के पहली बार चुनाव होने हैं, जिसका खासा असर बीजेपी पर पड़ सकता है। वहीं 22 सालों से सत्ता से दूर रही कांग्रेस गुजरात की सत्ता में आने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। हालांकि गुजरात में  भी दोनों पार्टियों ने अपनी-अपनी तरफ से चुनावी बिगुल फूंक दिया है। गुजरात के लिए अभी तक दोनों ही पार्टियों ने सीएम चेहरे का एलान नहीं किया है, जबकि मोदी के बिना होने वाले इस चुनाव में बीजेपी बैकफुट पर नजर आ रही है। इसके साथ ही पाटीदार नेताओं का सत्ताधारी पार्टी  के खिलाफ होना भी बीजेपी के लिए समस्या उत्पन्न कर सकता है तो वहीं कांग्रेस इस मुद्दे को भूनाने में लगी है। पिछले दिनों पाटीदार नेता हार्दिक पटेल का कांग्रेस उपाध्यक्ष से मिलने का एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें साफ तौर पर दिखा कि कांग्रेस बीजेपी से विमुख हुए पाटीदारों के सहारे गुजरात में दो दशकों से चल रहे वनवास को खत्म करने की जुगत लगा रही है। हालांकि गुजरात में 182 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने वाले हैं, जबकि 2012 विधानसभा चुनाव के आंकडे देखें तो बीजेपी के पास 115 सीटें, कांग्रेस के पास 61 तो अन्य के पास 4 सीटें हैं।

बता दें कि हिमाचल प्रदेश में चुनाव गुजरात में होने वाले चुनाव से पहले होने हैं, जबकि दोनों राज्यों के नतीजे एक साथ ही आने हैं। वहीं विधानसभा चुनाव की तारीखों के एलान के बाद हिमाचल प्रदेश के सीएम वीरभद्र सिंह ने शिमला (ग्रामीण) विधानसभा सीट को छोड़कर सोलन जिले की अर्की सीट से लड़ने का फैसला किया है। उन्होंने शिमला (ग्रामीण) सीट से अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। यह वही सीट है जहां पर साल 2012 में पहली बार हुए विधानसभा चुनाव में वीरभद्र सिंह ने बीजेपी उम्मीदवार को करारी शिकस्त दी थी। बता दें कि हिमाचल में पहाड़ो की रानी कहे जाने वाले शिमला में साल 2008 में हुए परिसीमन के बाद शिमला (ग्रामीण) विधानसभा सीट बनाई गई थी। हालांकि इस 68 सदस्यीय विधानसभा सीट की संख्या 64 और कुल मतदाताओं की संख्या 2012 में 68,326 थी। जाति विशेष बहुल क्षेत्र होने के कारण परिसीमन से पहले यहां बीजेपी का कब्जा था, लेकिन कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह ने जाति समीकरणों को उलटकर यहां कांग्रेस को पहली जीत दिलाई थी।

हालांकि विक्रमादित्य सिंह शिमला (ग्रामीण) क्षेत्र से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने जा रहे हैं। इसके साथ ही वह हिमाचल युवा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष भी हैं। वहीं पिछले विधानसभा चुनाव में हार का सामना करने वाली बीजेपी ने इस सीट से प्रोफेसर प्रमोद शर्मा को उतारा है। हालांकि शर्मा हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के प्रबंधन संस्थान में कार्यरत हैं। एक समय प्रमोद शर्मा को सीएम वीरभद्र सिंह का करीबी बताया जाता था। इससे पहले शर्मा नई दिल्ली में भारतीय युवा कांग्रेस के प्रवक्ता भी रह चुके हैं और 2003, 2007 और 2012 में ठियोग व कुमारसैन-सुन्नी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके हैं। प्रमोद की गांव-गांव में पहचान होने के कारण उन्हें जमीन से जुड़ा हुआ नेता बताया जाता है। इसके साथ ही प्रमोद शर्मा 2012 में तृणमूल कांग्रेस के हिमाचल प्रदेशाध्यक्ष भी रह चुके हैं। वहीं 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में करीब 74 फीसदी मतदान हुआ था, जिसमें 36 सीटें कांग्रेस को तो  26 सीटें  बीजेपीऔर निर्दलियों को 6 सीटें मिली थीं।

गौरतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करना बीजेपी के लिए जहां साख की बात है तो वहीं कांग्रेस इस चुनाव को जीत कर 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में दमदार वापसी करना चाह रही है, क्योंकि गुजरात में कांग्रेस के पास खोने के लिए तो कुछ नहीं लेकिन पाने के लिए बहुत कुछ है। इसके साथ ही बीजेपी हिमाचल प्रदेश में सत्ता पर काबिज हो कर देश को कांग्रेस मुक्त बनाने के अपने अभियान में एक कड़ी और जोड़ने की कोशिश में है।

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