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क्या आरएसएस जैसे दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी संगठन का मुकाबला कांग्रेस और तमाम क्षेत्रीय दल कर सकते हैं?

यदि कांग्रेस और तमाम क्षेत्रीय दल आरएसएस के विस्तार को रोकना चाहते हैं, तो उन्हें इस दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी संगठन की विचारधारा के बरक्स अपना वैचारिक बल खड़ा करना होगा और उसे लेकर जमीन पर उतरना होगा


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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हमारे तमाम मतभेद हो सकते हैं, लेकिन वर्तमान में एक वही ऐसा राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक संगठन दिखलायी पड़ता है, जिसकी अपनी एक सुस्पष्ट विचारधारा है और हर महत्वपूर्ण मसले पर जिसकी एक स्पष्ट राय है।

यह दीगर बात है कि उसका राजनीतिक उपकरण भाजपा फ़िलहाल सुविधा की राजनीति करने पर उतारू है।

इस मामले में केवल इस देश की कम्युनिस्ट पार्टियाँ ही आरएसएस के आसपास दिखती हैं, लेकिन उनमें वैचारिक स्तर पर संघ जैसी स्पष्टता और दृढ़ता का अभाव है।

बाक़ी जितने भी राजनीतिक दल वर्तमान में संघ से लोहा लेने की बात कर रहे हैं, उनकी कोई स्पष्ट विचारधारा ही दिखलायी नहीं पड़ती है।

कांग्रेस तो इस वक़्त अपने मूल मंत्र समाजवाद और पंथनिरपेक्षता के सिद्धांतों से पूरी तरह भटकी हुई लग रही है और वह फ़िलवक्त आरएसएस द्वारा सेट किए गए प्लेटफॉर्म पर मैच खेलने को मजबूर है।

इस तरह ये लोग कभी भी संघ और उसकी विचारधारा से मुकाबला नहीं कर पाएंगे। इन सभी विपक्षी दलों को याद रखना चाहिए कि भाजपा को चुनाव में हराना संघ की विचारधारा को हराना नहीं है।

यदि ऐसा होता, तो आज़ादी के बाद लगभग छह दशकों तक जनसंघ या बीजेपी के सत्ता से बाहर रहने के बावजूद आज संघ का इतना विस्तार नहीं हो जाता। संघ बौद्धिक और जमीनी, दोनों स्तरों पर ख़ामोशी से सतत विस्तार करता है।

यदि 2019 में येन-केन-प्रकारेण विपक्ष बीजेपी को सत्ता से बाहर कर देता है, तब भी वह संघ को कमज़ोर नहीं कर पाएगा। इसका परिणाम कुछ समय बाद पुनः सेकुलर दलों का पतन और भाजपा की वापसी होगी।

यदि कांग्रेस और तमाम क्षेत्रीय दल आरएसएस के विस्तार को रोकना चाहते हैं, तो उन्हें इस दक्षिणपंथी-प्रतिक्रियावादी संगठन की विचारधारा के बरक्स अपना वैचारिक बल खड़ा करना होगा और उसे लेकर जमीन पर उतरना होगा।

इस लिहाज़ से संघ ने हाल ही में दिल्ली के विज्ञान भवन में जैसा अपना वैचारिक कार्यक्रम आयोजित किया था, वैसा हर विपक्षी दल को करना चाहिए। कांग्रेस को तो ऐसे कार्यक्रम की विशेष आवश्यकता है।

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