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फीचर


सिनेमा का बदलता मिजाज, गुम हुआ मां का अहम किरदार

इस जिंदगी और समाज में कोई आइना देखना नहीं चाहता, लेकिन एक दूसरे को आइना दिखाने की होड़ जानलेवा है। चीजें तेजी से बदल रही हैं, प्रलय की तैयारी हर तरफ है। अपने जरूरत का सामान हर कोई जुटा रहा है। इसलिए चीजों की तरह रिश्ते भी कम हो रहे हैं। दोस्त हर कहीं हैं, हर रूप और रंग में...


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सिनेमा के नाम में ही मां है, इसलिए मां के बगैर फिल्मों की कभी कल्पना नहीं की जा सकती थी।  ‘मेरे पास मां है.....’  फिल्म ‘दीवार’ का यह डायलाग हिंदी फिल्मों का शायद सबसे पावरफुल डायलाग है, जिसे कई दशकों से हर दूसरा दुहराता रहा है। हमारी फिल्में भले ही हीरो हीरोइन या कभी कभार विलेन के लिए भी याद की जाती हों, लेकिन मां हमारी फिल्मों का एक ऐसा किरदार रहा है, जिसके बिना कहानी में ट्विस्ट ही नहीं आता था। वो लव स्टोरी क्या जिसमें बाप का अड़ंगा और मां का समर्थन न हो, वो बेटा क्या जो अपनी मां के लिए जान पर न खेल जाए और वो मां ही क्या जो अपने बच्चों के लिए सब कुछ लुटाने पर आमादा न हो जाए, लेकिन वक्त बदला तो सिनेमा का मिजाज भी बदला, दर्शक बदले, सिनेमा देखने का अंदाज बदला, नायक, खलनायक से लेकर बहुत कुछ बदला, तो मां का किरदार भी लगातार बदलता गया। आज हालात यह है कि फिल्मों की कहानी में मां बाप की कोई भूमिका ही नहीं होती। क्या यह बदलते सामाजिक परिवेश का असर है या फिर फिल्में लिखने बनाने वालों की बदलती सोच का?  

करण जौहर की अग्निपथ में जरूर मां थी, लेकिन यह फिल्म एक पुरानी फिल्म का रीमेक थी और इसकी कहानी आज के दौर की नहीं, बल्कि उसी वक्त की थी जब फिल्मों में मां का सचमुच महत्व होता था। कुछ फिल्मों में मां तो दिखती है, लेकिन उनका किरदार इतना कमजोर और बेदम होता है कि उनकी हैसियत किसी जूनियर आर्टिस्ट से ज्यादा नहीं होती। नब्बे के दशक की शुरुआत में जब सलमान आमिर और शाहरूख खान जैसे नई पीढ़ी के युवा नायक उभर कर आए तो इनकी मांओं के चेहरे भी बदले। मैंने प्यार किया से रीमा लागू के रूप में फिल्मी मां का एक नया ग्लैमरस चेहरा सामने आया, जो पहले की निरूपा राय, ललिता पवार, अचला सचदेव, दुर्गा खोटे, लीला मिश्रा, सुलोचना, लीला चिटनिस, दुलारी जैसी मांओं से एकदम जुदा था। रीमा के साथ हिमानी शिवपुरी, फरीदा जलाल, स्मिता जयकर और सुहासिनी मुले जैसी अभिनेत्रियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। लगान में आमिर की मां बनी सुहासिनी मुले के किरदार को याद कीजिए। काफी छोटी भूमिका होने के बावजूद पूरी फिल्म में इस चरित्र की मौजूदगी और अहमियत लगातार महसूस होती रहती है, लेकिन कुछ साल पहले सिनेमा के मिजाज में आए बदलाव ने फिल्मों में मां के किरदार पर खासा असर डाला। अब नो एंट्री,  भागमभाग, गरम मसाला,  रा वन, धमाल, लव सेक्स और धोखा,  गोलमाल जैसी फिल्मों में मां के होने की गुंजाइश ही कहां रह जाती है। दबंग में  मां है, लेकिन यह फिल्म उसी पुराने मिजाज की है जब मां सचमुच कहानी का अहम हिस्सा हुआ करती थी। 

फिर इधर जो नए किस्म का क्रॉसओवर सिनेमा उभरा है वह गिने चुने किरदारों के इर्द गिर्द ही घूमता है और उसमें मां के होने न होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।  इंसान के अपने जीवन में मां भले ही आज भी सबसे अहम हो मगर हमारे सिनेमा में मां का कद घटा है। वजह कारोबारी जोखिम है, जिसे कोई उठाना नहीं चाहता। टॉपलेस और टॉवेल का जमाना है, सिक्स पैक और फिगर बीच बहस में है। सिनेमा घरों से लेकर दर्शकों के अपने घरों का माहौल बदला है। फास्ट फूड और तुरत फुरत इश्क सबकुछ ऑनलाइन है, फेसबुक हकीकत है। इस फेस पर पर्दे हैं और पर्दे की हकीकत जानने और समझने का वक्त किसी के पास नहीं है। रिश्ते हीरो हिरोइन के इश्क से शुरू होते हैं और विलेन की मौत तक परवान चढते हैं। पीढियों और परिवार की कहानी किसी को पसंद नहीं, इसलिए सिनेमा को भी इन चीजों की जरूरत नहीं रही। हंसी खुशी मौज मजा, समाज की यही हकीकत हिंदी सिनेमा में हर कहीं मौजूद है।  रिश्तों और घर परिवार की शुरूआत मां से होती है, इसलिए सिनेमा में मां तो अब भी है, लेकिन वो मां न तो  निरूपा राय  है और न ही ललिता पवार। उस तरह के जो तत्व होते थे वे गायब हो गए हैं। रीमा लागू के आने से ऐसी माएं आने लगी हैं जो थोड़ी यंग हैं, आकर्षक हैं। यह शायद वक्त का तकाज है। ग्लैमर हर कहीं जरूरी है, इसलिए  आइटम डांस के लिए हेलन और बिंदू की जगह हीरोइन ही काफी है।

हिंदी सिनेमा कई बंदिशों को तोड़ चुकी है। समय की नब्ज की पहचान के साथ इसने नया दर्शक वर्ग तैयार किया है।  इसने विषय, भाषा, पात्र और प्रस्तुति सभी स्तरों पर अपने को बदला है। भारतीय दर्शक ने भी सिनेमा के इस परिवर्तित और अपेक्षाकृत समृद्ध रूप को स्वीकार किया है। इधर कुछ ऐसी फिल्में भी बन रही हैं, जिन्होंने सिनेमा और समाज के बने बनाए ढांचों को तोड़ा है। हंसी तो फंसी, हाईवे और क्वीन जैसी जैसी फिल्मों ने बिल्कुल नए तरह के सिनेमाई सौंदर्यशास्त्र का विकास किया है।  हाईवे  की वीरा एक उच्चवर्गीय और रसूखदार परिवार की लड़की है। बचपन से ही वह अपने पिता के बड़े भाई से शारीरिक शोषण का शिकार होती आई है।  जब वह इसके बारे में अपनी मां को बताती है, तो उसकी मां उसे चुप रहने की सलाह देती है। यही वह तथाकथित सभ्य वर्ग है  जहां बात बात पर लड़कियों को तहजीब और सलीके की दुहाई देता है और दीवारों के पीछे स्त्री को एक  वस्तु की तरह इस्तेमाल करता है। वीरा की मां का उसे चुप रहने की सलाह सिर्फ वीरा को नहीं, पूरे स्त्री समूह को दोषी बनाती है। फिल्म का एक महत्त्वपूर्ण पात्र है महावीर भाटी। वह वीरा का अपहरणकर्ता है। फिल्म में फ्लैश बैक के माध्यम से महावीर की मां से परिचय होता है। जो एक ग्रामीण  निम्नवर्गीय पात्र है। पति से पिटना और गाली सुनना जैसे उसकी नियति है। वीरा और महावीर की मां की नियति लगभग एक जैसी है और इस तरह दोनों के जीवन की कड़ियां एक ही बिंदु पर जाकर मिलती हैं। अंतर सिर्फ दोनों के सामाजिक स्तर में है, लेकिन  शोषण के तरीकों,  शोषण के हथियारों और शोषण करने वालों में कोई अंतर नहीं है। फिल्म में महावीर का एक संवाद इस शोषण के एक नए पहलू की ओर भी इशारा करता है, ‘गरीबन  की लुगाई की कहां इज्जत !’ इसी अन्याय का बदला लेने के लिए महावीर वीरा को कोठे पर बेचने की बात सोचता है। यहां फिल्म जेंडर के सवाल से आगे निकल कर वर्गीय टकराव की तरफ जाती है।

क्वीन आधी आबादी की आजादी और अस्मिता से जुड़े पहलुओं को आधारभूत और जरूरी स्तर पर समझने की कोशिश करती है।  एक आम लड़की के कमजोर होने बिखरने और फिर संभलने की कहानी है...  रानी नामक पात्र के माध्यम से फिल्मकार ने स्त्री की जिजीविषा और संघर्ष का बेहतरीन चित्रण किया है। जिस समाज में बचपन से स्त्री को घोड़े पर चढ़ कर आने वाले राजकुमार के सपने दिखाए जाते रहे हों,  उसमें अपने मंगेतर द्वारा ठुकरा दिए जाने पर उसकी क्या स्थिति होती होगी यह समझा जा सकता है...  रानी इसके लिए खुद को गुनहगार समझती है।  आस पड़ोस के लोग और रिश्तेदार उस पर दया दिखाने से नहीं चूकते।  थोड़ा संभलने के बाद वह अकेले यूरोप घूमने जाने का फैसला करती है। वही रानी जिसे पड़ोस की दुकान भी जाना होता तो उससे सात आठ बरस छोटे भाई को उसके पीछे लगा दिया जाता था। यूरोप अकेले जाती है। रानी की यह यात्रा सिर्फ उसकी नहीं, हर उस स्त्री के अस्तित्व और मानवीय गरिमा की यात्रा है, जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने सदियों से बंदिशों में बांध  रखा है। क्वीन इसी चंगुल से आजाद होने की कहानी है।

सिनेमा ने गुलामी और बंदिशों की बहुत सारी जंजीरों को तोड़ा है। वक्त के तेवर और तस्वीर का बदलना लाजमी है, सो बदलवा यहां भी है, मैलोडी नहीं, तीस सेकेंड का रिंगटोन म्यूजिक की कसौटी है। कहानी नहीं, अभिनय नहीं, तकनीक और तड़का जरूरी है। सामाजिक मायने बॉक्स ऑफिस की कसौटी पर कसे जा रहे हैं। सौ करोड़ के क्लब में शामिल होना अहमियत रखता है। सलमान, शाहरूख और आमिर के किस्से दोस्तों की गपबाजी में शुमार हो गए हैं। कैटरीना और दीपिका के फिगर पर किचन से ब्यूटी पार्लर तक बहस जारी है। कॉमेडी के कनेक्शन के बगैर स्टंट और ऐक्शन बेमजा है। लव है तो सेक्स और फिर धोखा जरूरी है। सिनेमा की पकड़ में वक्त का  नब्ज है। आखिरकार धोखा, बहुत हद तक यह शहरी जिंदगी का  फलसफा बन चुका है। सिनेमा इसी का आइना है। न मां, न बाप, न नाते, न रिश्ते, हर हाल में मजा। आइना देखने की फुर्सत किसी को नहीं है। गोरैया जिसे किसी ने आपस में लड़ते नहीं देखा। फिर भी यह पक्षी विलुप्त होता जा रहा है। वजह आइना है। अपनी छाया से गोरैया का डरना है। हमारी जिंदगी, खासतौर से शहरी जिंदगी गोरैया बनती जा रही है, जहां कोई विरोध नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं, कोई संघर्ष नहीं, अंदाज सब ठीक है, लेकिन इस जिंदगी और समाज में आइना वर्जित है। कोई आइना देखना नहीं चाहता, लेकिन एक दूसरे को आइना दिखाने की होड़ जानलेवा है। चीजें तेजी से बदल रही हैं, प्रलय की तैयारी हर तरफ है। अपने जरूरत का सामान हर कोई जुटा रहा है। इसलिए चीजों की तरह रिश्ते भी कम हो रहे हैं। दोस्त हर कहीं हैं, हर रूप और रंग में, दोस्तों और दोस्ती  का दौर है, जिंदगी में भी और सिनेमा में भी, पिक्चर जारी है...

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