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फीचर


भूख  से मौत रोक पाने में सरकारी योजनाएं नाकाम 

भारत में भूख एक गंभीर समस्या शुरू से रही है और हाल के दशकों में हमने इस समस्या का सबसे अमानवीय रूप देखा है।


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पिछले तीन दशक में ग्लोबल विकास की जिस छतरी के नीचे बैठकर भारत सहित पूरी दुनिया अपनी प्रगति और समृद्धि के सुलेख लिख रही है, उसका विरोधाभासी तथ्य अब हर तरफ जाहिर हो रहा है। विकास के हर दावे के साथ अब यह सफाई जोड़ने की जरूरत पड़ती है कि विकास का चरित्र समावेशी नहीं होने से ग्लोबलाइजेशन के दौर में दुनिया में अमीर-गरीब का फासला खतरनाक तौर पर बढ़ा है। बीते दिनों जब यह खबर आई कि झारखंड के सिमडेगा ज़िले में रहने वाली संतोषी की मौत भूख से हो गई तो उसमें मौत से ज्यादा चिंता पैदा करने वाली बात थी उसकी वजह। संतोषी की मां कोयली देवी का कहना है कि उनकी बेटी की मौत भूख से और सरकारी राशन नहीं मिलने से हुई है। इस खबर को लेकर चल रही चर्चा और राजनीति अभी ठंडी भी नहीं हुई कि झारखंड से ही एक और मौत की खबर आ गई। वजह फिर से एक बार भूख-गरीबी और इसे दूर करने वाली सरकारी योजनाअों की नाकामी बताई गई।

वैसे झारखंड से मौत की यह खबर कोई आपवादिक नहीं है। भारत में भूख एक गंभीर समस्या शुरू से रही है और हाल के दशकों में हमने इस समस्या का सबसे अमानवीय रूप देखा है। मई 2016 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में नत्थू नामक एक 48 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो गई। नत्थू कई दिनों से प्रदेश सरकार द्वारा वितरित किए जा रहे खाद्य पैकेट को प्राप्त करने का प्रयास कर रहा था। वह पांच दिन से भूखा था। 7 नवंबर 2015 को इलाहाबाद की बारा तहसील के गीज पहाड़ी गांव में मुसहर जाति के 35 वर्षीय समरजीत उर्फ तोताराम और उसकी सात वर्षीय बेटी राधा की भूख से मौत हो गई। पीयूसीएल की एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने पाया कि इलाके के मुसहरों की किसी प्रकार की जीविका आधार तकरीबन खत्म हो गया है। इन तमाम मामलों में प्रशासन और सरकार की पहली प्रतिक्रिया यही रही कि ये मौतें भूख के बजाय अन्य वजहों से हुईं, जबकि स्वतंत्र जांच में यह दावा गलत पाया गया। 

साफ है कि देश में भूख की स्याह सच्चाई अब ज्यादा खतरनाक शक्ल ले चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में समावेशी विकास के सरकारी प्रयासों का नतीजा इतना भर है कि इस साल भारत 119 देशों के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में तीन पायदान नीचे खिसककर 100 स्थान पर पहुंच गया है। गत वर्ष भारत इस इंडेक्स में 97वें पायदान पर था। भूख के मामले में भारत उत्तर कोरिया, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार जैसे देशों से भी पीछे है। समूचे एशिया में सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान भारत से पीछे हैं। इस इंडेक्स में चीन 29, नेपाल 72, म्यांमार 77, श्रीलंका 84 और बांग्लादेश 88वें स्थान पर हैं, जबकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्रमश: 106वें और 107वें पायदान पर हैं। अगले दो दशक के भीतर विश्व शक्ति बनने की कामना करने वाला देश मनरेगा और खाद्य सुरक्षा के लिए चलाई जा रही तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद अगर भूख से मौत की नींद सोते अपने नागरिकों को नहीं बचा पा रहा है, तो यह शर्मनाक तो है ही, साथ ही यह एक जरूरी सबक भी है, जिसे देश को अब समय रहते सीख लेना चाहिए। 

बात सिमडेगा में हुई मौत की करें तो मीडिया में जो खबरें हैं, उसके मुताबिक मार्च 2017 में मुख्य सचिव ने राज्य के सभी उपायुक्तों संग वीडियो कांफ्रेंसिंग कर ऐसे राशन कार्डों को रद्द कर देने को कहा था, जो आधार कार्ड से जुड़े न हों। यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सरासर उल्लंघन था। मुख्य सचिव के इस निर्देश पर खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग ने आपत्ति भी जताई थी, पर यह एतराज अनसुना रह गया। 

दरअसल, देश में यह प्रवृति बहुत तेजी से पनपी है कि सरकारें और सियासी जमाते यह मानने लगी हैं कि विकास अब हर चुनाव का कोर एजेंडा है। नतीजतन अपने प्रदर्शन को बेहतर दिखाने के लिए सरकारें किसी भी नीति को इस तरह डिजाइन करती हैं, जिससे वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके। आंकड़ों की बाजीगरी में विकास का श्रेय लेने वाली सरकारें चालाकी यह करती हैं कि वह लाभ की अर्हता रखने वालों की संख्या को तमाम तकनीकी बंदिशों में उलझाकर इतना कम कर देती हैं कि उनके लिए योजना की सफलता का दावा आसान हो जाता है। 

बात आधार कार्ड की करें तो इसकी अनिवार्यता को लेकर अब भी देश में बहस की स्थिति है। भारत सरकार अपनी तरफ से इसे विकास के डिजिटल दौर की दरकार भले बता रही हो पर हकीकत यह है कि आधार योजना ने अपने शुरुआती दौर से ही एक संरचनागत बहिष्करण को जन्म दिया है। इससे जन कल्याणकारी नीतियों का लाभ लेने से भारत की गरीब जनसंख्या एक बड़ा हिस्सा बहिष्कृत हो गया है।  बहिष्करण की यह सच्चाई राशन बंटवारे के मामले से लेकर मनरेगा और पुनर्वास के अनगिनत मामलों में भी देखी जा सकती है।  

 

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