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कैसे एबीवीपी ने हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों में सभी सीटों पर जमाया कब्जा, क्यों फेल हुए वाम दल?

इस तरह हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी ने 8 साल बाद क्लीन स्वीप किया है। लेकिन हकीकत यह भी है कि पिछले साल का एसएफआई, एएसए गठबंधन का छात्रसंघ पूरी तरह नकारा साबित हुआ था। उसपर नीम चढ़ा करेला यह कि इस बार यह दोनों ही संगठन अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे


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अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने दिल्ली विश्वविद्यालय में जीत दर्ज करने के बाद अब हैदराबाद विश्वविद्यालय में भी बड़ी जीत हासिल की है। छात्रसंघ चुनाव में एबीवीपी ने सभी सीटों पर कब्जा कर लिया है। इन नतीजों में एबीवीपी की आरती नागपाल को अध्यक्ष चुना गया है।

इस तरह हैदराबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी ने 8 साल बाद क्लीन स्वीप किया है। लेकिन हकीकत यह भी है कि पिछले साल का एसएफआई, एएसए गठबंधन का छात्रसंघ पूरी तरह नकारा साबित हुआ था। उसपर नीम चढ़ा करेला यह कि इस बार यह दोनों ही संगठन अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे।

पिछली बार भाषा विवाद पर एसएफआई के घोर अहंकारी और अलोकतांत्रिक रवैये की वजह से और किसी अन्य विकल्प में विश्वास नहीं रखने के कारण मैंने घोषित रूप से चुनाव में वोटिंग नहीं की थी।

इस बार एसएफआई पैनल को वोट जरूर किया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एसएफआई के साथ पिछले साल का मेरा सैद्धांतिक मतभेद खत्म हो गया हो। 

हालांकि सुनने में यह आया कि विभिन्न पदों के उम्मीदवारों की बहस में पिछले साल 'नो हिंदी नो हिंदी' और 'स्टॉप हिंदी इम्पोजीसन' का नारा बुलंद करने वालो का समर्थन करने वाले संगठन एसएफआई के ही एक उम्मीदवार ने इस बार बहस के लिए अपनी सहज भाषा हिन्दी को चुना और सकारात्मक यह रहा कि इसबार 'नो हिंदी' के नारे नहीं लगे।

उम्मीद करनी चाहिए कि इस कैंपस में अब मातृभाषा में अपनी बात रखने वालों पर कभी 'अपनी भाषा औरों पर थोपने' का बचकाना आरोप नहीं लगाया जाएगा।

मेरे खयाल से एसएफआई को चाहिए कि वो अपनी सभी पुरानी गलतियों की समीक्षा करे और उन्हें सुधारकर छात्रों के बीच अपनी विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए काम करे। जरुरी मुद्दों को उठाने के लिए छात्रसंघ में होना जरुरी नहीं है, इसके लिए किसी संगठन की ईमानदारी और इच्छाशक्ति ही काफी होती है।

नवनिर्वाचित एबीवीपी का छात्रसंघ जरुरी मुद्दों को संबोधित करने की मंशा रखता होगा इसमें मुझे शक है, लेकिन यदि ऐसा हो तो इसे सकारात्मक ही माना जाएगा।

(ऊपर लिखे गए ब्लॉग में व्यक्त विचार लेखक के अपने विचार हैं, इसके लिए खबरिया डॉट कॉम उत्तरदाई नहीं है।)

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