आईपीएल-11 : राशिद का हरफनमौला प्रदर्शन, हैदराबाद फाइनल में (राउंडअप)     |       कर्नाटक विधानसभा में मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने साबित किया बहुमत, BJP का वॉकआउट     |       2019 में अमेठी या रायबरेली हम जीतेंगे, SP-BSP साथ आए तो मिलेगी चुनौती: अमित शाह     |       निपाह का रहस्य गहराया: रिपोर्ट्स में खुलासा- वायरस फैलने की मुख्य वजह चमगादड़ नहीं     |       CBSE 12th Results 2018: सीबीएसई 12वीं के नतीजे आज होंगे जारी, cbseresults.nic.in पर देखें रिजल्ट     |       समिट रद्द करने के दूसरे दिन ट्रम्प ने जताई किम जोंग के साथ जल्द मुलाकात की उम्मीद, उत्तर कोरिया की तारीफ की     |       रोहिंग्या मुद्दे पर बांग्लादेश ने मांगी भारत से मदद     |       मेजर गोगोई की मुश्किलें बढ़ी, सेना ने जारी किया कोर्ट आफ इन्क्वायरी का आदेश     |       अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट की रवीश कुमार को जान से मारने की धमकी वाली खबर, एलजी से पूछा- है दम इस पर एक्‍शन लेने का     |       देश में पानी और तेल को लेकर आग     |       सीमा पर गोलीबारी व घुसपैठ बंद करे पाकिस्तान : महबूबा     |       नौतपा : पहले दिन मौसम के तेवर पड़े नरम, हल्की बारिश के बाद बढ़ी उमस     |       लेडी ट्यूशन टीचर ने नाबालिग छात्र से बनाए शारीरिक संबंध, खुलासा होने पर हुआ ये अंजाम     |       दिल्ली पुलिस ने सिसोदिया से 3 घंटे में पूछे 100 सवाल, कई के नहीं मिले जवाब     |       बिहार : 5 साल पहले महाबोधि मंदिर के पास हुए बम विस्फोट मामले में सभी 5 आरोपी दोषी करार     |       अपडेट.. सैन्य शिविर पर ग्रेनेड हमला, दो सैन्यकर्मी घायल     |       घर आने की योजना रद्दकर ड्यूटी पर लौट गया था शहीद     |       पाक शांति चाहता है तो आतंकवादी भेजना बंद करे: जनरल रावत     |       वायरल सच: हिंदू लड़की को मुस्लिम लड़के से अलग करने में गुंडागर्दी का सच     |       बंगले को लेकर बदला मायावती का लहजा, देश में शांति व्यवस्था प्रभावित होने की दी चेतावनी     |      

ब्लॉग


याद बॉबी केस की और जिक्र पामेला बोर्डेस का

पामेला 1982 में मिस इंडिया चुनी गई थी पर ग्लैमर की जिस दुनिया में वह मुकाम हासिल करना चाह रही थी वह दुनिया उसके आगे देह की नीलामी की शर्त रख देगी ऐसा शायद उसने भी नहीं सोचा था। 1982 वही साल है जब बिहार का बॉबी मर्डर केस सामने आया था


miss -ndia-sex-scandal-politics-call-girl-bobby-murder-case-pamela-bordes-mahesh-bhatt

पामेला बोर्डेस का नाम 1989 और 1990 के आसपास जब मीडिया की सुर्खियों में आया था तो दुनिया सिर्फ इस बात पर दंग नहीं थी कि तब की ब्रितानी हुकूमत और वहां की सियासत के साथ मीडिया जगत में अचानक भूचाल आ गया ...और वह भी एक कॉल गर्ल के कारण। भारत में तो लोग इस बात पर ज्यादा हतप्रभ थे कि इस सेक्स स्कैंडल में भारत की एक बेटी का नाम आ रहा है।

पामेला 1982 में मिस इंडिया चुनी गई थी पर ग्लैमर की जिस दुनिया में वह मुकाम हासिल करना चाह रही थी, वह दुनिया उसके आगे देह की नीलामी की शर्त रख देगा ऐसा शायद उसने भी नहीं सोचा था। 1982 वही साल है जब बिहार का बॉबी मर्डर केस सामने आया था। नेताओं और उनके बेटों ने सचिवालय में काम करने वाली एक महिला कर्मचारी को पहले तो हवस का कई बार शिकार बनाया और बाद में जब बात हाथ से निकलती दिखी तो उसका गला घोंट दिया गया।

दरअसल, पिछले दो-ढाई दशकों में भारत इन मामलों में इतना 'उदार’ जरूर हो गया है कि उसे अब ऐसी सनसनी के लिए सात समंदर पार तक की दूरी तय करनी पड़े। इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था अगर ग्लोबल हुई है तो परिवार, समाज और राजनीति में भी काफी कुछ बदल गया है। कैमरा, मोबाइल और इंटरनेट के दौर में एक तो निजी और सार्वजनिक जीवन का अलगाव मिट गया है, वहीं इससे गोपन के 'ओपन’ का जो संधान शुरू हुआ है, उसने कई दबी और गुह्य सचाइयों को सामने ला दिया। बात अकेले राजनीति की करें तो अंगुलियां कम पड़ जाएंगी गिनने में कि इस दौरान कितने नेताओं और सरकार के हिस्से-पुर्जों की मर्यादित जीवन की कलई खुलने के बाद मुंह ढांपने पर मजबूर होना पड़ा है।

हाल के कुछ सालों की बात करें तो भारतीय राजनीतिक यह सर्वाधिक अप्रिय प्रसंग अब आपवादिक नहीं रह गया है। इसके साथ ही स्त्री और राजनीति का साझा भी इस कदर बदल गया है, इसमें गर्व और संतोष करने लायक शायद ही कुछ बचा हो। इस स्थिति की गहराई में जाएं तो हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि सेवा और राजनीति का अलगाव तो बहुत पहले हो गया था। ऐतिहासिक रूप से यह स्थिति जयप्रकाश आंदोलन के भी बहुत पहले आ गई थी। अब तो वही लोग राजनीति में आ रहे हैं जिन्हें चुनाव मैनेज करना आता हो। धनबल और बाहुबल के जोर के आगे चरित्रबल को कौन पूछता है। फिर समाज का अपना चरित्र भी कोई इससे बहुत अलग हो, ऐसा भी नहीं है। टीवी-सिनेमा से लेकर परिवार-समाज तक चारित्रिक विघटन का बोलबाला है।

दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति के इस धूमिल अध्याय का पटाक्षेप अभी आसानी से होता तो नहीं लगता। क्योंकि जो स्थिति है उसमें इस चिंता को भी पूरी स्वीकृति नहीं है। ऐसे मौकों पर महेश भट्ट जैसे फिल्मकार इस दलील के साथ सामने आते हैं कि जीवन का भीतरी और बाहरी सच अब अलग-अलग नहीं रहा। जो है वह खुला-खुला है, ढंका-छिपा कुछ भी नहीं। नहीं तो ऐसा कभी नहीं रहा है कि संबंध और परिवार की मर्यादा वही रही हो, जैसी दिखाई-बताई जाती रही हो। भट्ट आगे यहां तक कह जाते हैं कि इस स्थिति पर सर फोड़ने के बजाय इसे स्वाभाविक रूप में स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि अगर इस स्वीकृति से हमने आदर्श और मर्यादा के नाम पर कोई मुठभेड़ की तो फिर हम सचाई से भागेंगे। यह नंगे सच की चुनौती है।

 

advertisement