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संपादकीय


आलोचनाअों से मोदी सरकार भी घबराती है!

अपने अब तक के कार्यकाल में पहली बार यह सरकार आर्थिक मोर्चे पर दबाव में दिख रही है और इससे निकलने के लिए उसकी तरफ से एक के बाद कदम उठाए जा रहे हैं।


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नरेंद्र मोदी सरकार को आलोचना पसंद नहीं। अगर आप सरकार, उसके मुखिया या उसकी नीतियों के खिलाफ जाएंगे तो देशद्रोही ठहरा दिए जाएंगे। घर के बाहर ‘भक्त’ लोग कभी भी ढंग से आपकी आरती उतार लेंगे। एेसी बहुत सी बातें इस सरकार को लेकर सोशल मीडिया में इन दिनों खूब चल रही है। पर अर्थव्यवस्था को पंप करने के लिए सरकार के उठाए गए कदमों को देखें तो शायद ये बातें सही नहीं है।

दरअसल, अपने अब तक के कार्यकाल में पहली बार यह सरकार आर्थिक मोर्चे पर दबाव में दिख रही है और इससे निकलने के लिए एक के बाद एक कदम उठाए जा रहे हैं। आलम यह है कि सरकार के खिलाफ जिस मुद्दे पर हर स्तर पर मुखरता देखी जा रही है, उसमें आर्थिक मुद्दा सबसे ऊपर है। यह हिमाचल और गुजरात के चुनाव में भी दिख रहा है। इस आलोचना की जमीन अभी नई-नई पकी है। आलोचना का पहला तीर चलाया था भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में 27 सितंबर को प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने सरकार पर जरूरी आर्थिक कदम नहीं उठाने का आरोप लगाते हुए कहा था कि पेट्रोलियम कीमतों, जीएसटी क्रियान्वयन में आ रही दुश्वारियों और बैंकिंग क्षेत्र को पेश आ रही वित्तीय समस्याओं को दूर करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए हैं।

इसके बाद राहुल गांधी भी इस मुद्दे पर अपनी तरफ से मुकरे हुए और वे अमेरिका से लेकर गुजरात तक इस मुद्दे पर लगातार बोल रहे हैं। पिछले चार हफ्तों में केंद्र सरकार आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर अपनी सक्रियता बढ़ाती नजर आ रही है, बहुत संभव है इसके पीछे असली वजह इन आलोचनाअों का दबाव हो। वित्त मंत्रालय ने इस अवधि में तीन तरह के कदम उठाए हैं। पहली श्रेणी में तेल कीमतों को काबू में रखने के लिए उठाए गए कदम हैं, दूसरी श्रेणी में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की खामियों को दूर करने वाले उपाय हैं जबकि तीसरी श्रेणी के उपाय सरकारी नियंत्रण वाले बैंकों की तनावग्रस्त परिसंपत्ति की समस्या को दूर करने और ढांचागत निवेश को प्रोत्साहन देने से जुड़े हुए हैं। इस बीच जीएसटी के नियमों को लेकर भी सरकार की नरमी देखने को मिली।

जीएसटी परिषद की बैठक में जीएसटी से संबंधित कारोबार जगत की कठिनाइयों को दूर करने के लिए कई उपायों की घोषणा की गई। निर्यातकों को बड़ी राहत देते हुए कहा गया कि कारोबारी निर्यातकों को निर्यात के मकसद से खरीदे गए सभी उत्पादों पर 0.1 फीसदी कम कर देना होगा। निर्यातकों से वसूले गए कर को समयबद्ध तरीके से रिफंड करने का भी फैसला उस बैठक में लिया गया। परिषद ने 27 उत्पादों पर लगने वाली जीएसटी दर को कम करने और वाहनों को लीज पर देने या टैक्सी किराये पर लेने जैसी सेवाओं पर लागू दर में भी रियायत देने का फैसला किया। सरकार ने 24 अक्टूबर को सार्वजनिक बैंकों में 2.11 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डालने का एक बड़ा ऐलान भी किया। इसमें 1.35 लाख करोड़ रुपये के पुनर्पूंजीकरण बॉन्ड जारी करने, बाजार से बैंकों को 58,000 करोड़ रुपये की इक्विटी जुटाने और 18,000 करोड़ रुपये सीधे केंद्र सरकार द्वारा डालने की बात कही गई है।

सरकार के इन कदमों से और कुछ हो न हो सेंसेक्स अपनी रिकॉर्ड चढ़ाई पर है और वह कभी भी 35000 के आंकड़े को पार सकता है। पर इकोनोमिक फ्रंट पर सरकार की तमाम फौरी कवायदों से एक बात तो साफ जाहिर है कि सरकार लगातार आलोचनाअों से घिरती जा रही थी। लिहाजा, उसे इकोनोमी से ज्यादा अपनी छवि की चिंता थी। आगे देखना होगा कि सरकार की छवि बचती है या आलोचनाअों से उठे सवाल राजनीति के केंद्र में बने रहते हैं। 

 

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