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विदेश


पनामा , विकीलीक्स और मीडिया का नया लोकतंत्र, एक नई दुनिया ले रही आकार

इंटरनेट और सोशल मीडिया के बढ़े जोर के बीच मीडिया की भूमिका और उसकी विश्वसनीयता की एक नई दुनिया आकार ले रही है


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विकास का नारों और ऊपरी दावों के बीच अकसर विकास का वस्तुस्थिति छिप जाती है। बावजूद इसके यह कौशल दिखाने में न तो सरकार चलाने वाले और न ही हर बात में उनकी पैरोकारी करने वाले पीछे हैं। वैसे बीते कम से कम दो दशक में देश में एक यह प्रवृति भी बढ़ी है, जिसमें विकास के मुद्दे को दरकिनार कर कोई भी दल चुनाव नहीं जीत सकता। इसलिए विकास और रोजगार जैसे मुद्दे कभी भी ज्यादा समय के लिए बहस से बाहर नहीं होते और इनके आंकड़े सरकार के प्रदर्शन को जांचने का तार्किक आधार बनते रहे हैं। बात करें मोदी सरकार की तो इस सरकार की एक खूबी यह तो जरूर रही है कि इसने विकास को हमेशा अपने कोर एजेंडे में शामिल रखा है, पर इसके लिए जो भी प्रयास अब तक किए गए हैं, वे निराशा बढ़ाने वाले हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल दो अक्टूबर 2016 को 1200 करोड़ रुपए के बड़े बजट के साथ 'प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना' की शुरुआत की थी। योजना का लक्ष्य देश में कुशल कामगारों की गिनती बढ़ाना और बेरोजगारी के बोझ को कम करना था। पर यह योजना अपने मकसद में कहीं से भी कामयाब होती नहीं दिख रही है। जुलाई 2017 के पहले हफ्ते तक के आंकड़ों के अनुसार इस योजना के तहत जिन 30.67 लाख लोगों को कौशल प्रशिक्षण दिया गया था, उनमें से 2.9 लाख लोगों को ही नौकरी के प्रस्ताव मिले। साफ है कि इस योजना के तहत प्रशिक्षित हुए लोगों में से महज 10 प्रतिशत से भी कम को नौकरी हासिल हो सकी। दरअसल इस असफलता के पीछे एक बड़ी वजह यह रही कि कौशल विकास प्रशिक्षण की गुणवत्ता बाजार की जरूरत पर खरी नहीं उतर रही है।

गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के शुरुआत में ही कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय का गठन किया था। हालांकि सरकार की तरफ से यह चालाक तर्क शुरू से दिया गया कि उनका मकसद लोगों को रोजगार मुहैया कराना नहीं, बल्कि रोजगार के लायक बनाना है। अब जबकि देश में बढ़ी बेरोजगारी को लेकर कई तरफ से आवाजें उठने लगी हैं, तो सरकार ने भी अपने भीतर कुछ बदलाव के साथ इस मंत्रालय के प्रदर्शन को सुधारने की कोशिश की है। इस कोशिश की तहत ही यह मंत्रालय राजीप प्रताप रूडी के हाथों से लेकर अतिरिक्त प्रभार के तहत पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को दिया गया है। वैसे प्रधान इन दिनों खुद देश के कई हिस्सों में पेट्रोल की कीमत 80 रुपए से भी ऊपर पहुंच जाने के कारण आलोचनाएं झेल रहे हैं।

बेरोजगारी के मुद्दे पर सरकार की नाकामी का आलम यह है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जब अपने अमेरिकी दौरे के आखिरी दिन न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वॉयर में भारतीय समुदाय के लोगों को संबोधित किया, तो सरकार को घेरने के लिए उन्होंने बेरोजदारी के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने दो टूक कहा, 'भारत में 30 हजार युवा हर दिन जॉब मार्केट में आते हैं, मगर उनमें से सिर्फ 450 को ही रोजगार मिल पाता है। यही आज भारत के लिए सबसे बड़ा चैलेंज है।' उन्होंने अमेरिका में अपने इस आरोप को भी दोहराया कि सरकार का फोकस देश की 50-60 कंपनियों पर ही है। नतीजतन छोटी और मझोली कंपनियों की हालत खस्ता हो रही है और इसका असर लोगों के रोजगार पर पड़ रहा है।

इस बीच, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) पहले ही इस बात की चेतावनी जारी कर चुका है कि 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी की स्थिति पहले की तरह बनी रहेगी। रोजगार सृजन के क्षेत्र में बाधा आने के संकेत के बारे में भी आईएलओ पहले ही कह चुका है। इस साल के शुरू में आईएलओ की जारी रिपोर्ट में कहा गया है, 'आशंका है कि पिछले साल के 1.77 करोड़ बेरोजगारों की तुलना में 2017 में भारत में बेरोजगारों की संख्या 1.78 करोड़ और उसके अगले साल 1.8 करोड़ हो सकती है। प्रतिशत के संदर्भ में 2017-18 में बेरोजगारी दर 3.4 प्रतिशत बनी रहेगी।'

यहां एक बात जो और समझने की है, वह यह कि मोदी सरकार जब 2014 में सत्ता में आई तो उसके पीछे जो बड़ी वजहें रहीं, उसमें सबसे अहम था कि युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलेंगे। नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी भाषणों में तो इस बात का जिक्र बार-बार किया ही, उस दौरान जो बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स देशभर में लगाई गईं, उसमें विकास के साथ भरपूर रोजगार का दावा भाजपा की तरफ से बढ़-चढ़कर किया गया था। लिहाजा बेरोजगारी के मुद्दे पर यह सरकार एक तरफ तो पहले दिन से ही जूझ रही है, वहीं दूसरी तरफ इस फ्रंट पर उसकी कोई भी कोशिश इतनी कारगर नहीं रही है, जिससे यह कहा जा सके यह सरकार अपने सबसे बड़े वादे को पूरा करने में सफल रही है या उस दिशा में तार्किक तौर पर बढ़ रही है। उलटे हुआ यह है केंद्र सरकार के रोजगार सृजन पर जोर के बावजूद देश में बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है। और यह स्थिति कोई नई बनी है, ऐसा भी नहीं है। श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, देश की बेरोजगारी दर 2015-16 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, जो पांच साल का उच्च स्तर है। अखिल भारतीय स्तर पर पांचवें सालाना रोजगार-बेरोजगारी सर्वे के अनुसार करीब 77 प्रतिशत परिवारों के पास कोई नियमित आय या वेतनभोगी व्यक्ति नहीं है। श्रम ब्यूरो के अनुसार, 2013-14 में बेरोजगारी दर 4.9 प्रतिशत, 2012-13 में 4.7 प्रतिशत, 2011-12 में 3.8 प्रतिशत तथा 2009-10 में 9.3 प्रतिशत रही। 2014-15 के लिए इस प्रकार की रिपोर्ट जारी नहीं की गई थी।

बेरोजगारी का सवाल विकास से सीधे-सीधे जुड़ा है। इसलिए रोजगार के क्षेत्र में सरकार की नाकामी का अध्ययन एकांगी तौर पर न करने के बजाय इस तौर पर भी करना होगा कि इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था भी अपनी सुस्ती से बाहर नहीं निकल सकी है। शेयर बाजार के आंकड़ों में देश की वित्तीय और कारोबारी स्थिति को पढ़ने वाले भी इस खतरे को नकार नहीं सकते कि अप्रैल-जून 2017 के दौरान भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में महज 5.7 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है। इससे पूर्व जनवरी-मार्च 2016 में जीडीपी में 9.1 फ़ीसदी की वृद्धि हुई थी। साफ है कि हालात सुधरने के बजाय लगातार बिगड़े ही हैं।

आखिर में एक बात और यह कि सरकार का मानना है कि उसने श्रम कानूनों में सुधार करने के लिए काफी काम किए हैं और अब बड़े स्तर पर काम देने वाले उद्योग चलाना अब कारोबार जगत की ज़िम्मेदारी है। लेकिन जैसा कि आंकड़ें बताते हैं यह वास्तव में नहीं हो रहा है क्योंकि भारत का उद्योग जगत श्रम आधारित की जगह पूंजी आधारित इंडस्ट्री को तरजीह देती है। ऐसे में बड़ी दरकार इस बात की है कि जब तक सरकार विकास और रोजगार सृजन की अपनी पहल को पूरी तरह समावेशी और विकेंद्रित मॉडल में नहीं बदल देती, तब तक हम रोजगार के आधार को स्थायी तौर पर बढ़ा नहीं कर पाएंगे। यह भी कि स्किल, डिजिटल से लेकर मेक इन इंडिया जैसी कोशिशों का जमीनी असर न अब तक दिखा है और न आगे ही इसके जरिए किसी चमत्कार की उम्मीद है।

 

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