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साहित्य/संस्कृति


पूर्ण प्रेम व्यक्ति से समष्टि की ओर जाता है

मैं उनसे प्रेम करने की हकदार नहीं हूं। पर उसने प्रेम किया और डूब कर किया। दुनिया के विरोध के बावजूद किया। मीरा का प्रेम में हंसते-हंसते जहर का प्याला पी लेना, प्रेम के साहस को ही तो दर्शाता है। दुनिया की ऐसी कौन सी दूसरी शक्ति है, जो यह करने की ताकत देती है। यही बात कबीर के बारे में भी कही जा सकती है।


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मेरे प्रेम की परिभाषा दूसरों के प्रेम की परिभाषा से अलग है। मैं पेड़ की छांव के नीचे बैठता हूं तो पेड़ से प्रेम महसूस करता हूं। बच्चा स्कूल जाता है, बेटी हंसती है तो मुझे अच्छा लगता है। मुझे इन सब में उतनी ही खुशी महसूस होती है, जितना प्रेम करने में होता है बल्कि ऐसा लगता है कि मैं प्रेम ही कर रहा हूं। इस जमाने में प्रेम के विभिन्न रूप हैं और मुझे सभी काफी भाते हैं। यह हैरानी की बात है कि प्रेम, जो इतना पाक साफ है, हमारे समाज में उसका भी विरोध है। इसे मैं अशिक्षा और विकास की गलत राह अपनाने का परिणाम मानता हूं। हमारा कॉमन मैन आज भी वैसा ही है, जैसा आर.के. लक्ष्मण के कार्टूनों में रहा है। उसका कोट फटा हुआ है, चश्मा टूटा हुआ है। वह बहुत खस्ताहाल है और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष उसे अमानवीय बनाता है। यह उसके जीवन में प्रेम का अवकाश नहीं छोड़ता। मतलब प्रेम से महरूम करता है। कई स्तरों पर यह संघर्ष उसके  जीवन में खिन्नता भी पैदा करता है और इस सबके प्रभाव में वह कब और कैसे प्रेम के विरोध में चला जाता है, उसे पता ही नहीं चलता। जमाने के प्रेम के खिलाफ होने की एक बड़ी वजह यह भी है। दूसरी वजहें भी हैं।  असल में प्रेम अपने स्वभाव में ही दुनियावी चलन के खिलाफ होता है। दुनिया में एक ऊंच-नीच है। यहां आदमी छोटे-बड़े होते हैं, प्रेम में नहीं होते। मीरा ने यह नहीं सोचा कि वह भगवान कृष्ण से प्रेम कर रही हैं और वह भगवान हैं मैं इंसान। मैं उनसे प्रेम करने की हकदार नहीं हूं। पर उसने प्रेम किया और डूब कर किया। दुनिया के विरोध के बावजूद किया। मीरा का प्रेम में हंसते-हंसते जहर का प्याला पी लेना, प्रेम के साहस को ही तो दर्शाता है। दुनिया की ऐसी कौन सी दूसरी शक्ति है, जो यह करने की ताकत देती है। यही बात कबीर के बारे में भी कही जा सकती है। उन्होंने भगवान से इंसान के प्रेम को और इंसान से इंसान के प्रेम को नया आयाम दिया। कबीर कहते हैं - 'न माला फेरूं, न व्रत करूं, मुंह से कहूं न राम/ राम हमारा हमे भजे रे, हम होएं गुमनाम, कबीरा हम होएं गुमनाम। यह प्रेम की शक्ति है। प्रेम में कायांतरण की ऐसी कितनी मिसालें मिलतीं हैं। वारिश शाह की हीर कहती है- 'रांझा-रांझा कहते मैं आप ही रांझा होई।‘ प्रेम इसी तरह से कायाकल्प करता है।

ऐसा नहीं है कि कोई भी चाहे और प्रेम कर ले। प्रेम करने के लिए योग्यता हासिल करनी पड़ती है। गालिब ने कहा है कि 'बस के दुश्वार है हर काम का आसां होना /आदमी को मयस्सर नहीं इंसां होना आदमी तो सब पैदा होते हैं, पर इंसान होने में जमाना लग जाता है और प्रेम करने के लिए सिर्फ आपका आदमी होना नहीं, इंसान होना भी जरूरी है। इंसान होने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ती है। इंसान ही प्रेम कर सकता है। इसके लिए अपने से लडऩा पड़ता है। बेहतर करना होता है। तभी प्रेम करने की योग्यता आती है। इस जमाने में यदि सबको प्रेम करने की योग्यता आ जाए, तो जमाने की आधी समस्याएं खत्म हो जाएंगी।

वैसे तो प्रेम के अनेक रूप होते हैं, लेकिन जमाने में प्रेम का सबसे लोकप्रिय रूप माशूका से प्रेम का है। यह प्रेम भी उतना ही पाक-साफ है, जितना खुदा से प्रेम का है बल्कि खुदा के प्रेम से यह कई अर्थों में बेहतर है, क्योंकि यह लौकिक प्रेम है। सुपर पावर से प्रेम की तरह यह अमूर्त प्रेम नहीं है। इस प्रेम की खासियत यह है कि इस एक प्रेम में आदमी कई जीवन जी लेता है। यह प्रेम इतना सरस है कि रोटी में चांद दिखने लगता है। नजीर अकबरावादी ने कहा है - 'हमको तो चांद में नजर आती है रोटी यह प्रेम अलग-अलग वक्त में अलग अलग शेप लेता जाता है। कभी उसमें सिर्फ फूल-पत्तियों की बात होती है तो कभी उसे समझदारी आती है। एक उम्र के बाद वह केयर बन जाता है, लेकिन यहां यह भी सच है कि अगर आप जमाने को प्रेम नहीं कर सकते तो अपनी माशूका से भी मुहब्बत नहीं कर सकते। माशूका को प्रेम करना दुनिया को प्रेम करने का ही एक निजी तरीका है। अगर आपका प्रेम माशूका तक महदूद रह जाता है तो कहीं न कहीं, वह अधूरा है। प्रेम की पूर्णता के लिए जरूरी है कि आप उसे व्यक्ति से समष्टि तक ले जाएं। बुद्ध ने यही किया था। महावीर ने यही किया था। दूसरे कई सारे लोगों ने ऐसा किया। तभी वे जमाने पर अपनी और अपने प्रेम की अमिट छाप छोड़ सके। अगर बुद्ध के मन में प्रेम नहीं होता, जीव जगत के लिए करुणा नहीं होती तो क्यों वे दुनिया को एक नया प्रेम देते।

आज बाजार प्रेम को नष्ट करने की, उसका रूप बिगाडऩे की कोशिश में है, पर वह इसमें सफल नहीं होगा। प्रेम के सामने बड़ी-बड़ी सत्ताएं पराजित हुर्ईं हैं तो यह खाप पंचायत वाले और ये बाजार क्या चीज हैं। आज दुनिया में इतनी हिंसा है, नफरत है। विनाशकारी हथियार हैं। इंसान-इंसान आपस में शत्रु जैसा बर्ताव कर रहे हैं। खुदा की इतनी सुंदर रचना, कायनात का यह रूप दुखी करने वाला है। इस हताशा के माहौल में मुझे सिर्फ प्रेम से ही उम्मीद बंधती है। मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि प्रेम कितना जरूरी हो गया है। प्रेम कितना कम हो गया है। हालांकि उसके दावे और प्रदर्शन कितने बढ़ गए हैं।             

(उमा शंकर से बातचीत पर आधारित)                                                                          

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