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फीचर


अँधेरे में रौशनी की लौ है गुलाबी सेना

गुलाबी सेना यानी 'पिंक आर्मी' नाम से चर्चित महिलाओं का समूह आज भारत के प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ है, जिसके तहत तकरीबन छह लाख गांवों में लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल हो रही है।


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दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के तमगे के बावजूद भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है। और यदि बात गाँव-देहात में स्वास्थ्य सुविधाओं की हो तो हालात और भी खराब हैं। 121 करोड़ की कुल आबादी पर मात्र 19,653 सरकारी अस्पताल हैं। गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की सुविधा महज अमीर व प्रभावशाली लोगों तक ही सीमित होकर रह गई है।

लेकिन इस अँधेरे में भी रौशनी की लौ गुलाबी साड़ियों में महिलाओं की एक फौज के रूप में जल रही है, जो गरीबों व वंचितों की सेवा में लगातार निस्वार्थ भाव से जुटी हुई है। खासतौर से ये महिलाएं उभरती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था में हासिए पर जा चुके देश के ग्रामीण इलाके में लोगों को स्वास्थ्य सेवा मुहैया करा रही हैं।

गुलाबी सेना यानी 'पिंक आर्मी' नाम से चर्चित महिलाओं का यह समूह आज भारत के प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ है, जिसके तहत तकरीबन छह लाख गांवों में लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल हो रही है। पिंक आर्मी में शामिल इन स्वास्थ्यकर्मियों को बमुश्किल से सोने का वक्त मिल पाता है, क्योंकि इनको दिन-रात लोंगों का बुलावा मिलता रहता है। पिंक आर्मी एक तरह से सामुदायिक व सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था के बीच सेतु का काम करती है। इसमें प्रशिक्षित सामुदायिक स्वास्थ्य सेवियों को ही शामिल किया जाता है और भारत सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी एनआरएचएम के अंतर्गत इन्हें मान्यता प्राप्त सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मी यानी आशा कहते हैं।

आशा की शुरुआत 2005 में हुई थी। तब भारत में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 50 थी, जोकि 2016 में घटकर प्रति हजार 34 रह गई है। जाहिर है कि शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में इन महिलाओं की अहम भूमिका रही है, क्योंकि ये स्वास्थ्यकर्मी गांवों में लोगों को स्वास्थ्य, सफाई और पोषण की जानकारी देती हैं और शिशु-जन्म के पूर्व व बाद की स्वास्थ्य जांच करवाती है। यही नहीं, महिलाओं को प्रसव के दौरान मदद करती हैं और पोलियो के टीके लगवाने के साथ-साथ स्वास्थ्य सर्वेक्षण में भी योगदान देती हैं। इनमें कई महिलाएं जो मां भी हैं, वे अक्सर अपने बच्चों को भी अपने साथ क्लिनिक ले जाती हैं, क्योंकि उनको असमय अपने काम पर जाना पड़ता है और वे अपने बच्चों को घर में छोड़ नहीं सकतीं।

ट्रेडमार्क गुलाबी साड़ी पहनी 23 वर्षीय गोदावरी अनिल राठौर सबसे कम उम्र की आशा सेविकाओं में शामिल हैं। वह कर्नाटक के कलबुर्गी, जोकि प्रदेश की राजधानी बेंगलुरू से तकरीबन 623 किलोमीटर उत्तर में है, की रहनेवाली हैं।

अपने बचपन की बातें याद करते हुए राठौर ने आईएएनएस को बताया कि वह छोटी बच्ची थीं, जब उनकी चाची की बच्ची जन्म के महज दो माह के भीतर चल बसी। बच्ची को जन्म के बाद ही मलेरिया हो गया था और मेरी चाची के लिए यह असहनीय अवस्था थी।

जब आप अपने बच्चे को बचा नहीं पाते हैं तो आपको कैसा दर्द महसूस होता है, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। यही कारण है कि मैंने महिलाओं की मदद करने का निर्णय लिया।

पिछले तीन साल में राठौर ने अपने जिले में एक सौ से ज्यादा महिलाओं की मदद की है, जिन्होंने स्वस्थ शिशु को जन्म दिया है।

वह कहती हैं कि उसके लिए सबसे ज्यादा खुशी की बात यह है कि देश के दूरवर्ती इलाकों में निवास करने वाली महिलाओं की वह देखभाल करती हैं। उनके पास उतने पैसे नहीं होते हैं कि वे अपनी सेहत का ख्याल रखें और उनका बच्चा भी स्वस्थ हो।

आशा सेविका राठौर ने बताया, "हम औसतन 12 घंटे रोजाना काम करते हैं, जिसमें स्वास्थ्य सर्वेक्षण, पोलियो अभियान का काम, गर्भवती महिलाओं की मदद आदि कार्य शामिल हैं। मैं उनकी गर्मधारण से लेकर प्रसव के समय तक की मेडिकल जांच और फिर बच्चों को टीके लगवाने तक उनकी मदद करती हूं। लेकिन महीने के अंत में सिर्फ 1,500 रुपये मिलते हैं। जिस महिला के साथ मैं काम करती हूं वह मेरे लिए परिवार की सदस्य की तरह होती है और तीन बजे रात में भी उसे मेरी जरूरत होती है तो मैं वहां पहुंचती हूं।"

स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय के 2014 के आंकड़ों मुताबिक, पूरे देश में आठ लाख 60 हजार आशा सेविकाएं हैं और ये सेविकाएं भारत के कई गावों में जहां अस्पताल नहीं हैं, वहां हजारों लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सहायता के लिए एक मात्र आशा की किरण होती हैं। पोलियो उन्मूलन और शिशुओं में कूपोषण दूर करने में इनका काफी योगदान रहा है।

स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए ये महिलाएं रोज त्याग की भावना प्रदर्शित करती हैं, लेकिन इसके बदले इन्हें मामूली-सी मेहनताना मिलती है, जिससे बमुश्किल से इनका गुजारा हो पाता है। कर्नाटक के 15,000 से ज्यादा आशा सेविकाओं ने पिछले महीने शहर के फ्रीडम पार्क में धरना-प्रदर्शन कर राज्य सरकार से बेहतर वेतन की मांग की थी, जिससे उनका जीवन यापन ठीक ढंग से हो सके और वे सम्मान के साथ जिंदगी बिताएं।

राठौर जैसी और भी कई आशा सेविकाएं हैं, जो दिन-रात अपनी सेवाएं देती हैं। उन्होंने बताया कि कई बार ऐसा होता है कि वह अपनी दो साल की बेटी लक्ष्मी को घर में नहीं छोड़ पाती हैं और उसे साथ ले जाना पड़ता है। आशा सेविकाओं को इस बात का गर्व है कि उनकी मदद से लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आई है।

राठौर ने कहा कि लोग सफाई पर ध्यान देने लगे हैं और शौचालयों का निर्माण कर रहे हैं। पानी को शुद्ध करके पीते हैं। पहले वे इन सब चीजों की ज्यादा परवाह नहीं करते थे।

उधर, बेलारी जिले की आशा सेविका 31 वर्षीय गीता बी नौ साल से अपनी सेवाएं दे रही हैं। गीता दो बेटों की मां होने की अपनी निजी जिम्मेदारी के साथ-साथ बेलारी के हरीजिनाडोन गांव में 1,500 से ज्यादा लोगों की सेवा करती हैं। वह कहती हैं कि उनका इरादा गांव को बेहतर बनाना है। उन्होंने अपने नौ साल के सेवा काल में कम से कम 300 महिलाओं को उनकी गर्भावस्था के दौरान मदद की है। अब वह गांव के स्कूल जाने वाले बच्चों की देखभाल करती हैं।

गीता के मुताबिक, किसी महिला के गर्भवती होने से उसके परिवार में खुशियां आती हैं। वह कहती हैं कि लोगों के सपनों को सच करने में उनकी मदद करने और भारत की भावी पीढ़ी को स्वस्थ बनाने के कार्य से उन्हें संतोष मिलता है।

रायचुर जिले की 35 वर्षीय नागोमी पांच बच्चों की मां हैं और वह पिछले 12 साल से अपने गांवों में आशा सेविकाओं के कार्य को देख रही हैं। उन्होंने आईएएनएस को बताया कि गांव में अगर बच्चों को कुछ होता है तो दोष महिलाओं पर होता है और महिलाओं को भी ऐसा लगता है कि उनकी ही गलतियों के कारण समय से पहले बच्चे का जन्म हुआ। लेकिन आशा सेविकाओं के नियमित आने से अब महिलाओं में ही नहीं, बल्कि पुरुषों में भी जागरूकता आई है और अब वे अपनी पत्नियों के स्वास्थ्य के बारे में जानने में रुचि रखते हैं।

कर्नाटक राज्य आशा कार्यकर्ता एसोशिएशन की सचिव डी. नागलक्ष्मी ने कहा कि ये महिलाएं हमारे देश में जहां स्वास्थ्य सेवा की सुविधा नहीं है, वहां के लोगों के लिए जीवन रेखा का काम करती हैं।

नागलक्ष्मी ने कहा कि कर्नाटक में 37,000 आशा सेविकाओं में प्रत्येक सेविका काफी दिक्कतों के बावजूद काम कर रही है और स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान दे रही है। 

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी की ओर से वर्ष 2016 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक मानव विकास सूचकांक यानी एचडीआई में भारत 188 देशों की की सूची में 131वें स्थान पर है। 

गौरतलब है कि इस सूची में भारत गैबन (109 वें), मिस्र (111 वें), इंडोनेशिया (111वें), अफ्रीका (119वें) और इराक अफ्रीका (121वें) समेत कई देशों से नीचे है।

सरकार इस रेटिंग में सुधार लाने की दिशा में प्रयासरत है और देश में प्रमुख सामाजिक संकेतक जैसे शिशु मृत्यु दर, मातृत्व मृत्य दर और जीवन-प्रत्याशा को बेहतर बनाने के लिए राज्यों के बीच स्पर्धात्मक माहौल पैदा करने पर जोर दे रही है।

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