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राजनीति


भगवान के देश में हिंसक संघर्ष, रक्त से लिखा जा रहा राजनीति का आख्यान

देश का सबसे पढ़ा-लिखा राज्य केरल, जिसे भगवान का देश तक कहा जाता है, वहां रक्त से राजनीति का नया आख्यान लिखा जा रहा है


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भारतीय राजनीति का वैचारिक पक्ष उदारीकरण के दौर के बाद से जिस तरह लगातार कमजोर पड़ा है, उसमें वैचारिक चुनौती का अब सीधा मतलब चुनावी जीत और सत्ता है। इधर 21वीं सदी के दूसरे दशक से पूरी दुनिया में दक्षिणपंथ का जोर दिखाई पड़ रहा है। इस जोर को जिन तीन वैश्विक घटनाओं के बल मिला, उसमें सबसे बड़ा कारण भारत से ही रहा। भाजपा यहां पहली बार अपने बूते केंद्र की सत्ता में आई और वह भी एक नए नेतृत्व के साथ। दूसरी और तीसरी वजह के रूप में अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने और ब्रेक्जिट की घटनाओं को गिना जाता है। बहरहाल, बात सिर्फ भारत की करें तो 2014 से ही भाजपा पूरे देश में कांग्रेस मुक्त होने का नारा दे रही है। देश के जिन प्रदेशों में कांग्रेस के बजाय दूसरे दल मजबूत हैं, वहां भाजपा अपने विस्तार के लिए खासी सक्रिय है। असम, जम्मू-कश्मीर और मणिपुर में सत्ता में आने के बाद भाजपा के निशाने पर अब दो सूबे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इसके लिए सघन रणनीति बनाई है। ये दोनों सूबे लंबे समय तक वाम राजनीति के गढ़ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में स्थानीय अंतरविरोधों के कारण वाम एकता दरकी और वह वहां लगातार दो बार से सत्ता से बाहर है। रही बात केरल की तो यह एक तरह से देश में वामपंथ का आखिरी गढ़ है। भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि जिस राजनीतिक विचारधारा से सर्वथा अलग रही है, वह वाम विचारधारा है। पर केरल में आज जिस तरह से राजनीतिक हिंसा हो रही है, वह सिर्फ वैचारिक संघर्ष की देन नहीं है। यह सीधे-सीधे सत्ता में आने की होड़ का नतीजा है। 

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता में आना और बने रहना अगर किसी दल के लिए एकमात्र अभीष्ट है तो इसे देश की राजनीतिक संस्कृति में आया बड़ा विचलन ही कहेंगे। आज भी देश में विरोध की राजनीति करने वाले जिन नेताओं के नाम तारीखी अहमियत के कारण लिए जाते हैं, उन्होंने सत्ता की राजनीति के बजाय लोकपक्षीय जागरुकता की राजनीति की। बात करें लोकतांत्रिक अवधारणा की तो इसमें भी यह विवेक बुनियादी तौर पर निहित है कि राजनीतिक सफलता का पैमाना सत्ता के बजाय वह वैचारिक आधार और दरकार है, जिससे सामयिक तकाजों के साथ जनता को जागरूक किया जाता है ताकि वह अपने हित में तार्किक फैसले ले सके। लोकतंत्र की इस पूरी प्रक्रिया के स्थगन के बाद अगर कोई दल अपनी ताकत को बढ़ते देखने की लिप्सा से भरा है, तो इसे नौतिक तौर पर लोकतांत्रिक दुर्बलता ही कहेंगे। 

केरल और पश्चिम बंगाल दोनों ही राज्यों में अगले विधानसभा चुनाव 2021 में होने हैं। पर इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनावों में इन सूबों में भाजपा अपने विस्तार को इतना बढ़ा देना चाहती है कि उसकी ताकत का प्रकटीकरण यहां एवीएम मशीनों से निकलने वाले नतीजों में भी प्रत्यक्ष दिखे। इसी मकसद से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने तीन अक्टूबर को केरल में हुंकार भरी और अगले दिन इस हुंकार में अपनी आवाज मिला दी यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने। दो हफ्ते तक चलने वाली जनरक्षा यात्रा के दूसरे ही दिन अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के तल्ख तेवर बताने के लिए काफी थे कि केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी केरल में अपनी सियासी पारी खेलने के लिए किस कदर बेकरार है। अब इस बेकरारी के लिए इस्तेमाल हो रहे प्रतीकों पर गौर करें तो जनरक्षा यात्रा में पहले बड़े चेहरे के तौर पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आगे करने के मायने खास हैं। योगी हिंदुत्ववादी राजनीति का चेहरा हैं। उनकी आक्रामक भगवा पहचान है। यात्रा के दौरान उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘केरल की धरती जिहादी राजनीति और लाल सलाम नहीं बल्कि राष्ट्रवादी राजनीति की धरती बनेगी।’ उन्होंने केरल में राजनीतिक हत्यायों का मुद्दा उठाते हुए कहा कि सरेआम हिंसा को प्रेरित करके जिहादी आतंक का माहौल यहां की सरकार ने बनाया है। यहां यह गौरतलब है कि केरल में जिस राजनीतिक संघर्ष की बात भाजपा कर रही है, उसका एक पहलू यह भी है कि वहां इसे रोकने के लिए कुछ सार्थक प्रयास हुए हैं। केरल के वरिष्ठ पत्रकार वेंकटेश रामकृष्णन बताते हैं कि इस साल जुलाई के आखिर में सर्वदलीय बैठक के बाद राजनीतिक हालात में सुधार हुआ है। पर जनरक्षा यात्रा के जरिए भाजपा ठंडे पड़ते तनाव को फिर से आंच देना चाहती है। 

यहां एक और बात समझने की यह है कि वामदलों के लिए तो केरल आखिरी गढ़ है, लिहाजा वह हर हाल में उसे बचाना चाहेगा, पर बात करें भाजपा की तो आखिर गुजरात के बाद केरल को वह अपनी हिंदुत्व की राजनीति के नए प्रयोगशाला के तौर पर क्यों देख रही है। दरअसल, यह सवाल भाजपा की देशव्यापी विस्तार और स्वीकृति से जुड़ा है। आजादी के बाद से आज तक अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा केरल के 10 फीसदी वोटरों का दिल ही जीत पाई है। जबकि केरल में संघ की सबसे ज्यादा करीब पांच हजार शाखाएं चलती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय संयोजक नंदकुमार एक इंटरव्यू में केरल के संघ कार्यकर्ताओं की संख्या 2019 तक 9 लाख पहुंचने का अनुमान जताते हैं। 2009 के आम चुनावों में केरल में भाजपा को जहां 6.4 फीसदी वोट मिले, वहीं 2014 में वोट प्रतिशत बढ़कर 10.3 फीसदी हो गया। कुछ सीटों पर तो लड़ाई बेहद करीबी रही। कुछ समय पहले हुए निकाय चुनावों में भी बीजेपी ने अच्छी बढ़त हासिल करते हुए कुछ जगह जीत का स्वाद भी चखा है। इससे पहले विधानसभा में उसका एक सदस्य पहुंच ही चुका है। दरअसल, जनता के बीच यही प्रसार भाजपा को वहां सत्ता के दुर्ग पर चढ़ाई की ताकत दे रहा है।

केरल में कन्नूर संघ-भाजपा और वामदलों के बीच हिंसक संघर्ष का सबसे बड़ा मैदान है। भाजपा ने यहीं से अपनी जनरक्षा यात्रा शुरू की है। अमित शाह ने यात्रा के पहले ही दिन आरोप लगाया कि जब-जब केरल में कम्युनिस्ट सरकार आती है, हिंसा शुरू हो जाती है और अब तक 120 से ज्यादा संघ-बीजेपी के कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी हैं। इन 120 हत्यायों में से अकेले 84 कन्नूर में हुई हैं। पर हिंसा की यह कार्रवाई कोई एकतरफा नहीं हुई है। 2000 से इस साल अगस्त तक सीपीएम के भी 85 कार्यकर्ताओं की हत्या केरल में हुई है। ये आंकड़े बताते हैं कि सत्ता के गलियारों में पैठ बनाने की कोशिशों का इतिहास किस कदर रक्तरंजित है। खून से लिखे ये हर्फ इस बात की ओर बार-बार इशारा कर रहे हैं कि देश में सत्ता और सियासी वर्चस्व के नाम पर अब जिस तरह के खूनी संघर्ष बढ़ रहे हैं वह राजनीति के अपराधीकरण से आगे का खतरा है। इस खतरे को लेकर आंख मूंदना देश में लोकतांत्रिक संस्कृति की बहुलतावादी खासियत को तो पूरी तरह खरोंच ही डालेगी, आगे के लिए एक आसान रास्ता राजनीतिक दलों के लिए यह भी खुल जाएगा कि चुनाव से पहले वह टकराव और भय के पारे को इतना ऊपर ले जाए कि विरोध का हर दांव उसके पक्ष में चला जाए। यह भी एक दुर्भाग्य ही है कि पहले जिस पश्चिम बंगाल से इस तरह की हिंसा की खबरें ज्यादा आती थी, उसने एक समय में भारतीय नवजागरण का सुनहरा सर्ग लिखा। अब देश का सबसे पढ़ा-लिखा राज्य जिसे भगवान का देश तक कहा जाता है, वहां रक्त से राजनीति का नया आख्यान लिखा जा रहा है। 

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