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संपादकीय


कालेधन पर सरकारी सुस्ती, पैराडाइज लीक्स से बढ़ेगा दबाव

बहरहाल, एक ऐसे समय में जब सरकार नोटबंदी के एक साल पूरे होने पर जश्न मनाने जा रही है, कालेधन से जुड़े एक और खुलासे ने देश-दुनिया के सियासी से लेकर आर्थिक हल्कों में सरगर्मी बढ़ा दी है।


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कालेधन को लेकर गहराई से शोध करने वाले प्रो. अरुण कुमार अक्सर यह दोहराते हैं कि कालाधन वह नहीं है, जिसकी चर्चा राजनीतिक मंचों से की जाती है या कि जिस पर जब-तब देश की संसद लोकप्रिय बहस आयोजित करती है। दरअसल, कालाधन सरकार, नीति और मंशा के बीच का वह चोर रास्ता है, जिससे एक भ्रष्ट सिस्टम चलता है। यह सिस्टम अगर चलना बंद हो जाए तो देश में राजनीति की तो सूरत बदल ही जाएगी सरकारों की भी प्राथमिकता बदल जाएगी।

बहरहाल, एक ऐसे समय में जब सरकार नोटबंदी के एक साल पूरे होने पर जश्न मनाने जा रही है, कालेधन से जुड़े एक और खुलासे ने देश-दुनिया के सियासी से लेकर आर्थिक हल्कों में सरगर्मी बढ़ा दी है। सरकार दावा कर रही है कि नोटबंदी के दौरान कंपनियों के बैंक खातों में करीब 7000 करोड़ रुपये जमा किए गए और बाद में निकाल लिए गए, जिस पर अब उसका शिकंजा कसने का इरादा है। पर इस पर वह क्या कहेगी जिसमें उनके मंत्री से लेकर विरोधी नेताअों और कई बड़े कारोबारियों पर विदेशों में धन रखने का नया खुलासा हुआ है। पनामा पेपर्स के बाद पैराडाइज पेपर्स के जरिये जो तमाम जानकारी सामने आई वह यह कि दुनिया के तमाम देशों में ऐसी कंपनियां अभी भी सक्रिय हैं जो धनी-मानी लोगों को टैक्स बचाने में सहूलियत प्रदान करती हैं। यही नहीं एेसा करने में वहां की सरकारें भी अपनी तरह से ढ़िलाई दिखाती हैं।

पैराडाइज पेपर्स में 714 भारतीयों के नाम दर्ज हैं। निस्संदेह यह एक बड़ी संख्या है। इससे पहले पनामा पेपर्स में 426 भारतीयों के नाम थे और इन सबकी जांच के बाद यह पता चला कि 147 मामले ही कार्रवाई के योग्य हैं। अब देखना यह है कि पैराडाइज पेपर्स की जांच किस नतीजे पर पहुंचती है। पनामा मामले में तो दो-दो देशों में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को इस्तीफा देना पड़ा। पर भारत में इस मामले में जांच की सुस्ती का लाभ अब तक दोषियों को मिल रहा है। देखना है कि पैराडाइज लीक्स के बाद भी क्या तफ्तीश और उसके बाद की कार्रवाई में इसी तरह की सुस्ती दिखेगी कि कालेधन से कड़ाई से निपटने का दावा करने वाली सरकार इस मामले में ठोस कार्रवाई का मन बनाएगी।

 

 

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