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साहित्य/संस्कृति


स्लीपिंग ब्यूटीः गाय दे मोपासां

बागों में घूमते हुए कभी-कभी उसके मन में कुछ सवाल उठते, भगवान ने यह सब क्यों बनाया? फिर वह मन-ही-मन अपने को भगवान की जगह खड़ा करता,


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यदि अब्बे मैरिनन उसे देवदूत कहता था तो ठीक ही कहता था। वह एक दुबला-पतला सा पादरी था। वह तो कुछ हद तक कट्टर ही था, लेकिन उसके विचार बड़े पवित्र थे। उसने अपने विचार तय कर लिए थे, जिसमें कहीं से लचीलापन नहीं था। उसका मानना था कि उसने भगवान को, उसकी इस सृष्टि को, भगवान की इच्छा को और इस सृष्टि के रहस्य को पूरी तरह से समझ लिया है।

बागों में घूमते हुए कभी-कभी उसके मन में कुछ सवाल उठते, भगवान ने यह सब क्यों बनाया? फिर वह मन-ही-मन अपने को भगवान की जगह खड़ा करता, दृढ़ता से विचार करता और संतुष्ट हो जाता, मानो उसने सभी रहस्यों को जान लिया हो। वह कोई इस तरह का आदमी नहीं था, जो धर्मभीरुता में यह कहने लगे, 'हे भगवान, तुम्हारी लीला हमारी समझ से बाहर है बल्कि वह तो यह कहता, 'मैं तो भगवान का सेवक हूं, मुझे यह जानना चाहिए कि प्रभु ने ऐसा क्यों किया और यदि नहीं जानता तो मुझे उसे जानने की कोशिश करनी चाहिए।

उसे लगता था कि प्रकृति में जो कुछ भी घटित होता है, उसके होने के पीछे एक तर्क है। उसका मानना था कि 'क्यों -'क्योंकि के बीच एक सामंजस्य होता है। सुबह इसीलिए होती है कि आप सुबह-सुबह उठकर आनन्दित हों, दिन इसीलिए निकलता है की फसल पके, बारिश इसीलिए होती है कि फसलों को पानी मिले, शाम सोने की तैयारी के लिए होती है, जबकि स्याह रात सोने के लिए बनी है।

चारों ऋतुओं का संबंध कृषि की जरूरतों से है। उसके मन में कभी यह ख्य़ाल नहीं आता था कि प्रकृति के इस चक्र के पीछे कुछ और भी हो सकता है। वह मानता था कि सभी जीव-जन्तु विभिन्न समय की विविध कठिन परिस्थितियों में जीने और उसे भोगने को अभिशप्त होते हैं।

लेकिन वह औरतों से बहुत घृणा करता था। वह उनसे अवचेतना के स्तर पर नफरत करता था और उन्हें तुच्छ समझता था। वह ईसामसीह के उन शब्दों को प्राय: दोहराता रहता था, 'इन औरतों का मैं क्या करूं? और वह आगे बोलता, 'भगवान भी इनको बनाकर बहुत खुश नहीं हुआ होगा। उसके लिए तो औरत किसी नाले के कीचड़ में सनी कोई गंदी-सी चीज़ थी। वे तो मात्र पुरुषों को रिझाने के लिए ही बनी होती हैं! वे अनैतिक और खतरनाक होती हैं। वह औरतों को समस्या पैदा करने वाले रहस्य के रूप में देखता था। यहां तक कि उनकी छली सूरत से अधिक वह उनके कोमल मन से भी घृणा करता था।

हालांकि कभी-कभी वह भी औरतों के आकर्षण से बंध जाता था, लेकिन वह ऐसे विचारों को मन से झटक दिया करता था, फिर भी प्रेम करने की इच्छा उसके मन को भी झकझोरती रहती थी। उसका मानना था कि भगवान ने औरतों को इसीलिए बनाया है कि वे पुरुषों को रिझाएं और उनका इस्तेमाल करें। वह मानता था कि पुरुषों को औरतों के पास जाने से बचना चाहिए और यदि कभी जाएं भी तो उन्हें सुरक्षा के सारे उपायों के साथ जाना चाहिए। एक औरत ऐसा जाल होती है, जिसकी बांहें फैली होती हैं और होंठ खुले होते हैं-मर्दों को फांस लेने के लिए।

उसके मन में जो थोड़ी-बहुत सहानुभूति थी, वह थी-'ननों के लिए, जो अपनी ही शपथ से इस तरह बंधी होती थीं कि वह उन्हें बिना दांत के मानता था। फिर भी वह उनके साथ कड़ाई से पेश आता था, क्योंकि शपथ से बंधे हुए उनके मन की गहराइयों से भी उनका वह नारीत्व फूटता रहता था, जो उसे सदा परेशान करता रहता था, हालांकि वह एक पादरी था।

उसकी एक भांजी थी, जो पास के ही एक छोटे-से घर में अपनी मां के साथ रहती थी। वह उसे भी चर्च से जोड़कर सिस्टर बनाना चाहता था। वह बहुत सुंदर, शोख और चुलबुली लड़की थी। जब अब्बे प्रवचन करता तो वह हंसती, जब वह उस पर गुस्सा करता तो वह उसे चूमने लगती और उसे अपने सीने से चिपकाने लगती, ऐसे में वह उसे झटककर दूर हटा देता, लेकिन यह चुहलबाज़ी उसे भी अच्छी लगती और उसके मन में भी पितृत्व की वह भावना जाग उठती जो हर आदमी में कहीं-न-कहीं छिपी बैठी होती है।

जब भी दोनों खेतों में पैदल टहलने निकलते, वह प्राय: उससे भगवान के बारे में, उसके भगवान के बारे में, बातें करता, लेकिन वह उसकी बातें सुनती न थी। वह आसमान की ओर देखने लगती, घास को देखती, फूलों को देखकर खिल जाती। कभी-कभी तो वह तितलियों के पीछे दौड़ पड़ती और उन्हें पकड़ लाती।

फिर चिल्ला पड़ती, 'मामाजी, देखिए कितनी सुंदर है, मेरा जी करता है कि मैं इसे खूब प्यार करूं। ये फूल और ये तितलियां पादरी को परेशान करती रहतीं, लेकिन फिर भी औरतों के मन की गहराई में हिलोरें मारता वह नारी-मन उसे छू जाता।

एक दिन गिरिजादार की पत्नी, जो अब्बे मैरिनन के घर की देखभाल करती थी, ने उसे बताया कि उसकी भांजी किसी से प्यार करती है! अचानक उसे एक झटका लगा। वह उस समय दाढ़ी बना रहा था। चेहरे पर साबुन के झाग लगे हुए थे। वह बुत बना सोच में पड़ गया।

लेकिन फिर अपने को संभालते हुए उसने चीखकर कहा, 'यह सच नहीं है। मेलानी, तुम झूठ बोल रही हो, लेकिन ग्रामीण महिला ने सीने पर हाथ रखकर कसमें खानी शुरू कर दीं, अगर मैं झूठ बोल रही हूं तो इसका हिसाब भगवान करेगा। मॉन्जियर ला क्यूरो, मैं आपको बता रही हूं ना कि रोज़ शाम में जैसे ही आपकी बहन सो जाती है, वह उसके पास चली जाती है। वे दोनों नदी-किनारे मिलते हैं। आप वहां रात के दस बजे या आधी रात को जाइए और अपनी आंखों से देख लीजिए।

वह अपनी ठुड्डी को सहलाता हुआ घंटों चहल-कदमी करता रहा और गहरे ख्य़ालों में गुम रहा। जब उसने फिर से दाढ़ी बनाने की कोशिश की, उसने नाक से लेकर कान तक की अपनी ही चमड़ी तीन-तीन बार काट ली।

वह दिन भर चुप रहा और गुस्से का घूंट पीता रहा। उसे ऐसा लग रहा था मानो, उसकी अदम्य धार्मिक आस्था, जिसमें एक पिता की नैतिकता, एक गुरु की दीक्षा और एक ब्रह्मचारी के ब्रह्मचर्य की शक्ति घुली-मिली थी, को आज प्रेम की अखंड सत्ता ने झकझोर कर रख दिया हो, ध्वस्त कर दिया हो, वह भी किसी बच्चे के हाथों। उसका अहं भी ठीक उसी तरह आहत हो गया था, जिस तरह एक माता-पिता का अहं तब आहत हो जाता है जब उन्हें यह मालूम होता है कि उनकी बेटी ने उनकी पसंद और अनुमति के बगैर अपना वर चुन लिया है।

रात को पढऩे के बाद उसने कुछ पढऩे की कोशिश की, लेकिन पढ़ नहीं पाया। गुस्से का गुबार उसके मन में फूल-पिचक रहा था। जैसे ही दस बजा, उसने अपनी छड़ी उठाई। जब भी वह रात में बाहर निकलता छड़ी ले लेता। जब भी बीमारों को देखने जाता, छड़ी उसके पास ही रहती। छड़ी की मूठ पकड़कर उसे हवा में घुमाता रहता। वह मुस्कराया और अपने खेतिहरों जैसे सख़्त हाथ में डंडे को सख़्ती से पकड़ हवा में घुमाने लगा। फिर अचानक उसने दांत किटकिटाते हुए डंडे को जोर से कुर्सी पर दे मारा।

उसने बाहर जाने के लिए दरवाजा खोला, लेकिन फिर चौखट पर ठिठककर खड़ा हो गया। बाहर चांदनी बिखरी हुई थी। वह चौंक गया। यह एक अद्भुत चांदनी रात थी। था तो वह भी एक ऊंची सोच का, जैसा कि कोई स्वप्निल कवि या पादरी होता है। अचानक वह रात की इस सुनहरी छटा को देख मुग्ध हो गया।

उसके इस छोटे से बागीचे में कतार से खड़े फलों के पेड़ चांदनी में नहाए हुए थे। पेड़ों की डालियों ने जैसे हरियाली ओढ़ रखी थी। घर की दीवारों से चिपके लता-बेला खुशबू से लबरेज अद्भुत दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे पूरी रात एक खुशबू की सौगात लेकर आई हो।

उसने गहरी सांस ली और स्वच्छ हवाओं के झोकों को ऐसे पी गया जैसे कोई शराबी पैमाने से घूंट भरता है। वह धीरे-धीरे चहलकदमी करता हुआ अचरज से भरा हुआ बढ़ता जा रहा था। भांजी का तो ख्याल तक नहीं था उसके दिमाग में!

जैसे ही वह बाहर खुले मैदान में आया, चांदनी में नहाई हुई रात की खुमारी से भर उठा। अब उसे कुछ भी याद न रहा। चांदनी रात में मेंढकों की टर्र-टर्र से संगीत फूट रहा था। दूर कहीं बुलबुल चहचहा रही थीं। अब उसके मस्तिष्क में कोई और विचार नहीं रहे, बल्कि वह सपनों में तैरने-उतराने लगा था।

अब्बे चलता रहा। वह अजीब-सा महसूस कर रहा था। क्यों, मालूम न था! पता नहीं क्यों, वह थका-थका सा महसूस करने लगा था। अब उसे बैठने की इच्छा हो आई थी। उसे भगवान की इस सृष्टि की प्रशंसा करने का दिल कर रहा था।

नीचे नदी के किनारे पहाड़ी पीपल के पेड़ कतार में खड़े थे। नदी की घुमावदार धारा से दुधिया चांदनी टकराकर जैसे धुंध-सा कुछ बिखेर रही थी। चांदनी में धुंध भी जैसे चांदी-सा चमक रही थी।

पादरी रुका और जैसे उसने अपने मन को प्रकृति के इस भाव से भर लिया हो। वह संदेह से भी देख रहा था और परेशान भी हो रहा था। उसने महसूस किया कि जो सारे सवाल वह अपने आपसे पूछता रहता था, उसके मन में फिर से उठ खड़े हुए थे।

भगवान ने इस सृष्टि का निर्माण क्यों किया? यदि रात सोने के लिए बनी है, अवचेतन में समा जाने और सब कुछ भूल जाने के लिए बनी है, तो फिर भगवान ने इसे इतना खूबसूरत, दिन से भी ज्यादा हसीन क्यों बनाया? इसे सुबह और शाम से भी ज्यादा सुंदर क्यों बनाया? और ये छोटे-छोटे टिमटिमाते तारे! ये तो सूरज से भी अधिक काव्यात्मक हैं, बल्कि ये तो सबकुछ प्रकाशमान कर देते हैं! कैसे रहस्यमयी हैं, जो सारी परछाइयों को उजाले से भर देती हैं- उस महान प्रकाश-पुंज से! और यदि रात सचमुच सोने के लिए बनी है तो ये सभी संगीत बिखेरते जीव औरों की तरह क्यों नहीं सो जाते हैं? इस घनी रात में क्यों गाते रहते हैं? दुनिया ऐसे क्यों ढंक-सी जाती है? दिल में हलचल क्यों, क्यों भावनाओं का गुबार, शरीर में यह खिंचाव क्यों? लोग इसे क्यों महसूस नहीं करते? आखिर जन्नत से उतरकर धरती पर आई यह काव्य-धारा किसके लिए? अब्बे इसे समझ नहीं पा रहा था।

तभी घास के मैदान पर उसे दो परछाइयां दिखीं। धुंध में नहाए हुए पेड़ों के साये में टहलती हुई दो मानव-आकृतियां। लड़का लंबा था। उसने लड़की के गले में बांहें डाल रखी थीं और बार-बार लड़की का माथा चूम ले रहा था। वे मानो इस बेजान तस्वीर में जीवन भर दे रहे थे। वे दोनों एक हो गए से दिख रहे थे। ऐसा लग रहा था कि रात की यह खामोशी उनके लिए ही बनी हो और आज वे दोनों पादरी के पास मानो उन सारे सवालों के जवाब लेकर आए हों, जो वह अपने भगवान से पूछा करता था।

वह बुत बना खड़ा रहा। उसकी धड़कन तेज हो गई थी। उसे रुथ और बोज़ के प्यार की वह कहानी याद आ गई, जो उसने बाइबिल में पढ़ रखी थी। उसकी अंतरात्मा झंकृत हो उठी। उसने अपने अंदर प्रेम के संगीत का प्रवाह महसूस किया और अपने आपसे कहा, 'शायद भगवान ने इस दुनिया को प्रेम के भाव से भर देने के लिए ही रात बनाई है।

वह उस प्रेमी जोड़े के सामने से दूर हट गया। दोनों हाथों में हाथ लिए चले जा रहे थे। यह उसकी भांजी ही थी। अब उसने फिर अपने आपसे सवाल किया कि क्या वह भगवान के आदेश का अनादर करने को आतुर नहीं हो आया है? क्योंकि भगवान उसे प्रेम करने की इज़ाज़त नहीं देता, जबकि वह ऐसी अद्भुत छटा से भी घिरा हो!

वह जाने लगा था। वह आश्चर्य से भरा हुआ था। थोड़ा शर्मिंदा भी था, क्योंकि उसने एक ऐसे मंदिर में प्रवेश करने की इच्छा की थी, जहां उसे प्रवेश की अनुमति नहीं थी।

-गाय दे मोपासां

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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