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संपादकीय


विपक्षियों का यह जुटान भविष्य की राजनीति में बड़े  बदलाव का प्रस्थानबिंदु हो सकता है

 यह तय है कि 2019 के चुनावों में विपक्ष बिखरा हुआ नहीं रहेगा और यह विपक्षी  एकता भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरने का काम कर सकती है


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शपथ ग्रहण के बाद अब विश्वास मत  की बारी है, विपक्षी मजबूत हैं पर पर शायद वे ऐसा कोई काम न करें जिससे जो शर्मिंदगी उन्हें झेलनी पड़ी है। उसमें और इजाफ हो इसलिये सरकार का बच जाना और बन जाना मुमकिन दीखता है। यह सरकार अपनी उम्र पूरी करती है या नहीं बहस का विषय अब यह नहीं है और है भी तो यह छोटा मामला है। बड़ी बात यह कि इस शपथ ग्रहण समारोह  के दौरान विपक्षी एकता  का जो मेगा शो दिखा वह भविष्य की राजनीति की बड़ी तस्वीर पेश करता है।

इस विपक्षी मोर्चे या संगठन की अगुवाई कौन करेगा, क्या राहुल गांधी के नाम पर सहमति बन सकेगी या फिर मायावती,  ममता को सभी स्वीकारेंगे, या फिर नवीन पटनायक या चंद्रबाबू जैसा चेहरा उभर कर सामने आयेगा, कौन सी क्षेत्रीय पार्टी अपने बंटवारे में कितने सीटों पर चुनाव लड़ेगी, उन राज्यों का क्या होगा, जहां कांग्रेस का मुकाबला  बीजेपी की बजाये अपने साथ आयी क्षेत्रीय पार्टी से होता आया है। इस तरह के बहुतेरे सवाल आमने हैं, भाजपा इनकी आड़ लेकर सत्ता पक्ष  से दूर जाने वाले मतदातओं को अपनी तरफ करने की कोशिश कर सकती है।

प्रधानमंत्री मोदी  अपने भाषणों में इंदिरा गांधी के तरह यह अपील कर सकते हैं कि मेरा नारा है देश से भ्रष्टाचार और बेरोजगारी हटाओ  जबकि विपक्ष का एकमात्र नारा है मोदी हटाओ। भाजपा यह साबित करने का प्रयास करेगी कि सभी मिल कर एक अकेले मोदी को हराने की साजिश कर रहे हैं, जो देश के लिये दिलो जान से कुर्बान हैं। यह भावनात्मक अपील  बहुत असरकारक हो सकती है पर इसको संयुक्त विपक्ष  से कड़ी चुनौती मिलेगी।

गोरखपुर और फूलपुर इसके उदाहरण हैं जहां भाजपा अधिक मत प्रतिशत ले कर भी हारी। चुनावी गणित यह कहता है कि भाजपा के लिये तकरीबन 200 सीटों पर मुसीबत बढ सकती है। कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में भले चंद्रशेखर और स्टालिन न आ सके पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, संप्रग अध्यक्ष मां सोनिया गांधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू, अरविंद केजरीवाल और पिनाराई विजयन ,तेजस्वी यादव, फारूक अब्दुल्ला, मायावती और अखिलेश यादव और इसके अलावा जो अन्य  नेता इकट्ट्ठा हुये, जिनका समर्थन मिला अगर उनके द्वारा प्रभावित सीटों की गणना की जाये तो यह आंकड़ा 300 तक पहुंचता है।

विपक्षी एकता की यह तस्वीर भाजपा  के लिये हौलनाक साबित हो सकती है। सामूहिक विपक्ष की इस बड़ी चुनौती  को भाजपा जुमलों से पार पा लेगी या फिर खोखले दावों से तो यह उसकी खुशफहमी ही कही जायेगी। निस्संदेह भाजपा को अब सत्ता बचाने के लिये सघन तैयारी  करनी होगी और विपक्ष को अपनी एका बढाने की, भाजपा अपनी तैयारी पहले ही आरंभ कर चुकी है। विपक्षी एकता की  शुरुआत अब से मानी जानी चाहिये।

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