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संपादकीय


'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस'  में तो आगे पर जेंडर इंडेक्स में लुढ़का भारत

डब्ल्यूईएफ के महिला-पुरुष समानता सूचकांक में भारत 21 पायदान फिसल कर 108वें स्थान पर आ गया है


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'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' में भारत की स्थिति अब भले जरूर सौ देशों के भीतर आंकी ज रही है, पर जेंडर इंडेक्स में हमारा प्रदर्शन खासा निराशाजनक है। वैसे यह जरूर है कि आधी दुनिया की लैंगिक समानता का संघर्ष दुनिया के साथ भारत में भी तेजी से बढ़ा है। उदारीकरण के दौर में जहां महिलाअों के लिए कार्य करने के अवसर बढ़े हैं, वहीं पुरुषों के वर्चस्व को भी उन्होंने कई क्षेत्रों में तोड़ा है। पर स्थिति अभी पूरी तरह बदलनी बाकी है। दिलचस्प है कि भारत में भले बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों के जरिए महिला सश्कतिकरण को बढ़ावा मिल रहा हो, पर जमानी हकीकत अब भी काफी स्याह है।

दिलचस्प है कि लैंगिक असमानता का रोना उस आईटी जगत में भी है, जिसने लैंगिक वर्जनाअों के बीते दो दशकों से काफी तेजी से तोड़ा है। गूगल के 28 वर्षीय कर्मचारी जेम्स डामोर को कार्यस्थल पर महिला-पुरुष समानता के संदर्भ में संस्थान की ‘महिलाओं के अनुकूल’ नीति की मूर्खतापूर्ण आलोचना करने के कारण नौकरी से निकाल दिया गया। उनको पता होना चाहिए था कि उनके साथ ऐसा ही होगा। डामोर ने दलील दी थी कि प्रौद्योगिकी उद्योग में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व की जैविक वजहें हो सकती हैं। उनके इस बयान की गूगल के भीतर और बाहर जमकर आलोचना हुई और लोगों ने नाराजगी जाहिर की।

बात करें भारत की तो विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के महिला पुरुष समानता सूचकांक में अपना देश 21 पायदान फिसल कर 108वें स्थान पर आ गया है तथा अर्थ व्यवस्था और कम वेतन में महिलाओं की भागीदारी निचले स्तर पर रहने से भारत अपने पड़ोसी देशों चीन और बंगलादेश से भी पीछे है। इस सूची में शामिल 144 देशों में बंगलादेश 47वें और चीन 100वें स्थान पर है। इस सूची में आइसलैंड लगातार 9वें साल शीर्ष पर है जबकि इसके बाद नार्वे और फिनलैंड हैं। जब डब्ल्यू.ई.एफ. ने 2006 में इस तरह की सूची पहली बार प्रकाशित की थी उस हिसाब से भी भारत 10 स्थान पीछे है।

डब्ल्यूईएफ की स्त्री-पुरुष असमानता रिपोर्ट-2017 के अनुसार भारत महिला-पुरुष असमानता को कम करके 68 प्रतिशत तक ले आया है जो उसके कई समकक्ष देशों से कम है। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो स्थिति बहुत अच्छी नजर नहीं आती। शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्यस्थल तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व के चार मानकों के आधार पर पहली बार डब्ल्यू.ई.एफ. की रिपोर्ट में स्त्री पुरुष असमानता बढ़ी है और रिपोर्ट में कहा गया है कि दशकों की धीमी प्रगति के बाद 2017 में महिला पुरुष असमानता को दूर करने के प्रयास ठहर से गए हैं। आलम यह है कि देश में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले 65 प्रतिशत काम का उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता जिसमें घर और बाहर दोनों तरह का काम शामिल है। पुरुषों को जिस काम के 100 रुपए मिलते हैं महिलाओं को उसी काम का पुरुषों के मुकाबले 60 प्रतिशत पारिश्रमिक ही मिलता है।

जहां तक राजनीतिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी का संबंध है, बेशक लगभग आधी शताब्दी पूर्व एक महिला प्रधानमंत्री होने के कारण यह रैंकिंग में 15वें स्थान पर है पर विधायिका में महिलाओं की भागीदारी बहुत खराब (11 प्रतिशत) है। कुल मिलाकर यह रिपोर्ट भारत में स्त्री-पुरुष असमानता की ङ्क्षचतनीय तस्वीर पेश करती है और रिपोर्ट के संकेतों के अनुसार यह असमानता दूर होने के निकट भविष्य में दूर-दूर तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देते।

इसी साल जारी हुए जेंडर बैलेंस इंडिया सर्वे से पता चलता है कि देश के कॉर्पोरेट जगत में महिलाओं की भागीदारी 20-22 प्रतिशत है। वरिष्ठ और शीर्ष स्तर पर यह भागीदारी घटकर 12-13 फीसदी रह जाती है। जाहिर है कि महज नेक इरादे जताने से कुछ नहीं होता है।

 

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