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संपादकीय


विधानसभा चुनावों को क्यों न मानें अर्थव्यव्सथा पर जनमत संग्रह!

बहरहाल, बात करें दो राज्यों के विधानसभा चुनावों पर तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद जनता का मूड भांपने का बड़ा अवसर है। केंद्र सरकार के दोनों फैसलों से देशभर के लोग प्रभावित हुए


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हिमाचल प्रदेश नई विधानसभा चुनने के लिए पोलिंग बूथों के आगे कतार में खड़ा है। इसके बाद गुजरात में विधानसभा चुनाव होंगे। दिलचस्प है कि इन दोनों चुनावों का उनसे जुड़े राज्यों की राजनीति से ज्यादा देश की आर्थिक-राजनीतिक स्थिति पर प्रभाव पड़ने वाला है। भारत में किसी मुद्दे पर रेफरेंडम लेने की कोई व्यवस्था नहीं है। पर देश में जब-तब चुनाव होते रहते हैं और इसे ही उस समय के अहम सवालों पर रेफरेंडम मान लिया जाता है। कायदे से एेसा मानना पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि हर चुनाव के अपने संदर्भ और मुद्दे होते हैं।

बहरहाल, बात करें दो राज्यों के विधानसभा चुनावों पर तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि नोटबंदी और जीएसटी के बाद जनता का मूड भांपने का बड़ा अवसर है। केंद्र सरकार के दोनों फैसलों से देशभर के लोग प्रभावित हुए इसलिए उनके मतदान के इरादे उनके अनुभवों से जरूर प्रभावित होंगे, एेसा माना जा सकता है। अलबत्ता इसे पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर कोई जनमत संग्रह नहीं कह सकते। इस पर चर्चा तो आगे भी अर्थ पंडितों के बीच ही होगी। मसलन निराशा से भरे लोग कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था वर्ष 2016 की पहली तिमाही से ही अपनी गति खो चुकी है। तब से वर्ष 2017 की दूसरी तिमाही तक वृद्धि 8.7 फीसदी से गिरकर 5.7 फीसदी पर आ चुकी है।

श्रम ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि बेरोजगारी वर्ष 2011-12 के 3.8 फीसदी से उछलकर वर्ष 2015-16 तक 5.0 फीसदी पर आ गई। सन 2015-16 और 2016-17 में विनिर्मित वस्तु क्षेत्र की वृद्घि में गिरावट आई और वह 10.8 फीसदी से गिरकर 7.9 फीसदी रह गई। वहीं विनिर्माण वृद्धि दर 5.0 फीसदी से गिरकर 1.7 फीसदी हो गई। बुनियादी क्षेत्र की कई परियोजनाएं लंबित हैं। इसी तरह मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों को पसंद करने वालों की नजर में सरकार के कदम सुधारवादी हैं और इसके नतीजे आगे देखने को भी मिलेंगे। उनके मुताबिक आरबीआई ही नहीं बल्कि आईएमएफ और एडीबी जैसे बाहरी संस्थान भी अर्थव्यवस्था के अगले वर्ष 6.7-7.4फीसदी की दर से विकसित होने की बात कर रहे हैं। बीएसई-सीएमआईई के सर्वेक्षणों के मुताबिक बेरोजगारी घटी है और यह अगस्त 2016 के 9.82 फीसदी से कम होकर सितंबर 2017 में 4.47 फीसदी रह गई है। 

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